विभिन्न ज्योतिषियों के भविष्यवाणी में एकरुपता के अभाव , जिसके कारण फलित ज्योतिष को अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जाता है , के कारणों को ढूंढ़ने के क्रम में श्री विद्यासागर महथाजी के वैज्ञानिक मस्तिष्क को ज्योतिष की दोनों कमजोरियॉ दृष्टिगत हुई।
फलित ज्योतिष की पहली कमजोरी ग्रहों के शक्ति आकलण की थी। हजारो कुंडलियों का अध्ययन करने के पश्चात् 1981 में इन्होनें ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति को ढूंढ निकाला। सूर्य और पृथ्वी से किसी ग्रह की कोणिक दूरी से उस ग्रह की गत्यात्मक शक्ति को प्रतिशत में निकाल पाने के सूत्र मिल जाने के बाद उन्होनें परंपरागत ज्योतिष को एक कमजोरी से छुटकारा दिलाया।
फलित ज्योतिष की दूसरा कमजोरी दशाकाल निर्धारण की पारंपरिक पद्धतियों में थी। अपने अध्ययन क्रम में उन्होने पाया कि ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्था के अनुसार ही मानव जीवन पर उसका प्रभाव 12-12 वर्षों तक पड़ता है। जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक चंद्रमा , 12 से 24 वर्ष की उम्र तक बुध , 24 से 36 वर्ष की उम्र तक मंगल , 36 से 48वर्ष की उम्र तक शुक्र , 48 से 60 वर्ष की उम्र तक सूर्य , 60 से 72 वर्ष की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वर्ष की उम्र तक शनि , 84 से 96 वर्ष की उम्र तक यूरेनस , 96 से 108 वर्ष की उम्र तक नेप्च्यून और 108 से 120 वर्ष की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही `गत्यात्मक दशा पद्धति´ की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं।
उपरोक्त दोनों वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। `गत्यात्मक दशा पद्धति में नए-नए अनुभव जुड़ते चल गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया , जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि , जन्मसमय और जन्मस्थान की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख , और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया।धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ।



