आज जब सभी सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है , सभी परंपरागत ज्योतिषी राहू , केतु और विंशोत्तरी पद्धति के भ्रामक जाल में फंसकर अपने दिमाग का सही सदुपयोग नहीं कर पाने से तनावग्रस्त हैं , वहीं ज्योतिष विज्ञान का इस नए युग के अनुरुप गत्यात्मक विकास हो चुका है। लोगों को यह जानकर अत्यधिक प्रसन्नता होगी , जब उन्हें मालूम होगा कि फलित ज्योतिष के सिद्धांत , नियमों और उपनियमों के घने बीहड़ जंगलों में , जहॉ अब तक लोग भटकाव की स्थिति में थे , अब झाड़-झंखाड़ों को काटकर एक सुंदर पथ का सृजन किया जा चुका है। हमारा लक्ष्य पुराने मोतियों को चुनकर उन्हें पिरोकर ऐसी माला तैयार करने का था , जो आधुनिक युग की नई पीढ़ी की नयी जीवनशैली के अनुरुप हो और इसमें हमें सफलता भी मिली। इस कारण ही खोजों से संबंधित नई दशापद्धति का नामकरण `गत्यात्मक दशा पद्धति´ किया गया है।इस दशापद्धति के आगे प्रयुक्त गत्यात्मक शब्द प्रतीकात्मक हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है-गति से संबंधित। अत: गत्यात्मक दशा पद्धति कहने से उस दशा पद्धति का बोध होता है , जिसमें ग्रह-प्रदत्त दशाकाल ग्रहों की गति पर आधारित हो। दूसरा अर्थ उस दशा पद्धति से है , जिसमें गति है और यह ज्योतिष जैसे शास्त्र को गति प्रदान कर विज्ञान बना सकता है । वैसे भी जब कोई शास्त्र विज्ञान बन जाता है , तो उसमें स्वयमेव ही गति आ जाती है। इस दशा पद्धति में ग्रहों की गतिज और स्थैतिक उर्जा की प्रतिशत तीव्रता को सिम्मलित कर इसका सीधा संबंध जातक की संपूर्ण परिस्थितियों , अनुभूतियों , महत्वाकांक्षा , कार्यक्षमता , सुख-दुख , सफलता और असफलता से जोड़कर इसे विज्ञान का स्वरुप प्रदान किया गया है। जन्मपत्री देखकर ही मनुष्य की प्रवृत्ति और प्रकृति को बतलाया जा सकता है। उसके लिए कौन-कौन से पक्ष सुख देनेवाले बनें रहेंगे , कौन-कौन से महत्वपूर्ण बनें रहेंगे और किन-किन पक्षों से उसे कष्ट होता रहेगा , यह बतलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जीवन के कौन सा भाग सुखद , कौन महत्वपूर्ण और कौन सा कष्टप्रद बना रहेगा , इसे भी बतलाया जा सकता है। किस ग्रह के किस स्थिति में होने से दिमाग में किस प्रकार की बातें गंभीरता से आएगी , इसे भी आसानी से बतलाया जा सकता है।
(श्री विद्यासागर महथाजी द्वारा लिखित `फलित ज्योतिष : कितना सच कितना झूठ´ की पांडुलिपि से उद्धृत)
गतिशील विचारधारा यानि वैज्ञानिक विचारधारा
September 23, 2007 by संगीता पुरी



