बापू के जीवन में ग्रहों का प्रभाव
October 2, 2007 by संगीता पुरी
अपनी पुस्तक में `कमजोर चंद्रमा और असाधारण व्यक्तित्व´ नामक लेख में ही मैंने उल्लेख किया है कि समाज राजनीति और प्रतिष्ठा के मामले में बापू का दृष्टिकोण क्यों असाधारण रहा। चंद्रमा की स्थिति सिंह राशी में है , जो कि सूर्य की राशी है , इस कारण असाधारण कार्य करने की प्रवृत्ति सूर्य के गत्यात्मक दशाकाल के चरम तक यानि 48 वर्ष की उम्र से 54 वर्ष की उम्र तक ही बनीं। 1916 में चंपारण , 1917 में खेडा , 1918 में अहमदाबाद और 1919 में रॉलेट एक्ट के लिए किए गए कामों के आधार पर उनके असाधारण व्यक्तित्व को महसूस किया जा सकता है।
उनकी जन्मकुंडली में बृहस्पति वक्री है , जो गत्यात्मक ज्योतिष के हिसाब से कमजोर माना जाता है। यूं तो बृहस्पति का प्रभाव 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र तक होता है ,किन्तु 54वें वर्ष के बाद ही इसके प्रभाव को महसूस किया जा सकता है और 66 वें वर्ष में यह अपनी चरम सीमा पर होता है। इस द्रष्टि से 1923 से ही उनके कार्यक्रमों में कुछ बाधाएं आनी शुरु हो गयी , इसलिए वे राजनीति से दूर रहकर रचनात्मक कार्यों में लग गए। 1929 के पश्चात् बृहस्पति के गत्यात्मक दशाकाल के आरंभ होने पर उन्होने सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि को जिस ढंग से शुरु किया गया , उसी रुप में कायम नहीं रह सका और 1935 तक उनका आंदोलन पूरी तरह सफल नहीं था . 1935 से 1941 तक भी परिस्थितियों में कुछ सुधार के बावजूद महात्मा गॉधी के सपने को साकार कर सकनेवाली स्थिति नहीं बन पायी। इस तरह बृहस्पति के गत्यात्मक दशाकाल में 12 वर्षों तक वे परेशानी में ही जूझते रहे।
किन्तु उनकी जन्मकुंडली में शनि शीघ्री गति का है , जो गत्यात्मक दृष्टि से मजबूत माना जाता है । इस शनि का प्रभाव मानवजीवन पर 72 वर्ष से 84 वर्ष की अवधि तक महसूस किया जाता है। 78वें वर्ष में यह अपनी चरम सीमा पर होता है। इस दृष्टि से 1941 के पश्चात् ही परिस्थितियों में अचानक सुधार दिखायी पड़ा और 1942 से ही `भारत छोड़ो आंदोलन´ की शुरुआत संभव हो सकी। दिन-पर-दिन उन्हें सारे कार्यक्रमों में सफलता मिलती गयी और 1948 तक उनको अपने लक्ष्य की प्राप्ति हो चुकी थी। किन्तु चूँकि शनि अतिशीघ्री मंगल की राशी में ऋणात्मक है , इसलिए धर्म के आधार पर देश के बंटने को वे रोक न सके। इसी वर्ष इनको अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा।



