नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं

देखते ही देखते पुराना वर्ष व्यतीत हो गया और साथ लाया नया वर्ष नए.नए उमंगों और आशाओं को लिए। नए वर्ष का स्वागत करते हुए हम पुराने वर्ष के हसीन पलों को ही याद रखें , न कि कठिन पलों को। आनेवाला वर्ष अवश्य सफलताओं का नया इतिहास लिखनेवाला होगा , ऐसी उम्मीद करते हुए दृढ संकल्प से योजना बनाकर काम करते चले हम सब। मेरे चिटठे के पाठकों और समस्त चिटठाकारों को बहुत बहुत शुभकामनाओं के साथ ——-.

शनि ने सोनियाजी को ही माध्यम क्यों बनाया ?

गत्यात्मक ज्योतिष से संबंधित मेरे लेखों को पढ़ने के बाद जनसामान्य को इस बात की जानकारी अवश्य हो गयी होगी कि सौरमंडल में स्थित सुदूर ग्रहों का प्रभाव मनुष्य के जीवन में बिल्कुल अंतिम समय में पड़ता है। यदि शनि ग्रह की बात की जाए , तो गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार इसका प्रभाव मानवजीवन पर 72वें वर्ष से लेकर 84वें वर्ष की उम्र तक पड़ता देखा गया है। यदि शनि सूर्य से कम दूरी पर स्थित होते हैं , तो जातक वृद्धावस्था के बावजूद इस उम्र में सफलता प्राप्त करता है , 72वें वर्ष से 78वें वर्ष तक क्रमशः उनकी स्थिति अच्छी होती जाती है। इसके विपरीत , शनि सूर्य से अधिक दूरी पर स्थित हो , तो एक तो वृद्धावस्था , दूसरी ओर मनोनुकूल वातावरण का अभाव , मनोबल टूटने लगता है। 72वें से 78वें वर्ष तक लागातार ऐसा ही स्थिति बनी होती है। जन्मकुंडली में मजबूत शनि के कारण ही 72वें वर्ष में एन टी रामारावजी 1995 में पुनः मुख्यमंत्री बनें , नेल्सन मंडेलाजी 72वें वर्ष से ही सफलता प्राप्त करते हुए 76वें वर्ष में आफ्रिका के राष्ट्रपति , अटल बिहारी वाजपेयीजी 72वें वर्ष यानि 1996 के पश्चात प्रधानमंत्री और महात्मा गांधीजी 72वें वर्ष यानि 1941 के पश्चात् स्वतंत्रता आंदोलन की गति को तेज करते हुए 78वें वर्ष में यानि 1947 में देश को स्वाधीन करने में सफल हो सकें। जन्मकुंडली में कमजोर शनि ने ही जवाहरलाल नेहरूजी के समक्ष 72वें वर्ष की उम्र यानि 1961 के पश्चात् प्रधानमंत्री के रूप में घरेलू समस्याओं और आर्थिक संकट को उपस्थित किया था।

                         प्रधानमंत्री मनमोहनसिंहजी की जन्मकुंडली में स्वक्षेत्री शनि सूर्य से मात्र 28 डिग्री की दूरी पर अतिशीघ्री गतिसंपन्न है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिलजी की जन्मकुंडली में भी स्वक्षेत्री शनि सूर्य से 57 डिग्री की दूरी पर शीघ्री गति का है। इस दृष्टि से इन दोनों को ही 72 वर्ष की उम्र के बाद सफलता मिलनी चाहिए थी । यदि स्तर की बात की जाए , तो न तो मनमोहनसिंहजी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए कोई राजनीतिक वातावरण था और न ही प्रतिभा पाटिलजी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए ही। किन्तु ग्रह को अपने चमत्कार दिखाने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता तो होती ही है। ऐसी माध्यम बनीं श्रीमती सोनिया गांधी , जिनके सहयोग से 72 वर्ष की उम्र पूरे करने के आसपास ही यानि मनमोहनसिंहजी को इससे छः महीनें पूर्व और प्रतिभा पाटिलजी को छः महीनें पश्चात् क्रमशः प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की कुर्सी प्राप्त हो गयी। आखिर दोनों ही जगहों पर शनि ने सोनिया गांधी को ही माध्यम क्यों बनाया , यह एक विचारणीय प्रश्न है।

ग्रहों की गति और भावफल

किसी भी जन्मकुंडली के विभिन्न भावों के फल से ग्रह गति का गहरा संबंध है। किसी भी भाव की भविष्यवाणी उस भाव के स्वामी या उस भाव में स्थित ग्रहों की ग्रहगति को देखकर आसानी से की जा सकती है।

प्रथम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक को सामान्यतया बहुत अच्छा स्वास्थ्य और शरीर प्राप्त होता है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक शरीर के लिए बहुत महत्वाकांक्षी होता है , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को शारीरिक कष्ट या कमजोरी का सामना करना पड़ता है।

द्वितीय भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया धनी परिवार में जन्म लेता है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक धन संपदा की बढ़ोत्तरी के लिए बहुत महत्वाकांक्षी होता है , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को आर्थिक कष्ट या कमजोरी का सामना करना पड़ता है।

तृतीय भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया भाई.बहन से अच्छे संबंध रखता है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के भाई.बहन महत्वपूर्ण स्थान पर होते हैं , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को भाई.बहन से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

चतुर्थ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया माता से अच्छे संबंध रखता है, सुख आर स्थायित्व देनेवाले हर साधन उसके पास मौजूद रहते हैं। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति dा सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रचुर संपत्ति होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को माता और संपत्ति से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

पंचम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया संतान से अच्छे संबंध रखता है, दिमाग के तेज होने से वे और उनके संतान अाराम से विद्याध्ययन करते हैं।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास बुद्धि ज्ञान की प्रचुरता होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को बुद्धि-ज्ञान की और संतान पक्ष की कमजोरी से  कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

षष्ठ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक किसी झंझट को दूर करने की पूरी क्षमता रखता है। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रभाव की मजबूती होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को रोग-ऋण और शत्रु की कमजोरी से  कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

चतुर्थ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया माता से अच्छे संबंध रखता है, सुख आर स्थायित्व देनेवाले हर साधन उसके पास मौजूद रहते हैं। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रचुर संपत्ति होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को माता और संपत्ति से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है  A

पंचम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया संतान से अच्छे संबंध रखता है, दिमाग के तेज होने से वे और उनके संतान आराम से विद्याध्ययन करते हैं।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास बुद्धि ज्ञान की प्रचुरता होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को बुद्धि-ज्ञान की और संतान पक्ष की कमजोरी से  कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

षष्ठ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक किसी झंझट को दूर करने की पूरी क्षमता रखता है। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रभाव की मजबूती होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को रोग-ऋण और शत्रु की कमजोरी से  कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

सप्तम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया अपने जीवनसाथी से से अच्छे संबंध रखता है, लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो का जीवनसाथी और ससुराल पक्ष बहुत स्तरीय होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने जीवनसाथी  से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

अष्टम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक बहुत आरामदायक रूटीन से जीवनयापन करता है।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के जीवन जीने का ढंग सुव्यवस्थित होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने अस्तव्यस्त रूटीन से  कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

नवम् भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक भाग्य का सहयोग प्राप्त करता है ।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के  के भाग्य धर्म आदि चिंतन के विषय होते हैं, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक अपने भाग्य से कष्ट का सामना करने के कारण अंधविश्वासी हो जाता है

दशम् भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया अपने पिता से अच्छे संबंध रखता है,उसे अपने स्तर और रूचि के अनुरूप नौकरी प्राप्त होती है। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पिता और पद प्रतिष्ठा का माहौल स्तरीय होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने पिता और पद प्रतिष्ठा से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

एकादश भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक के लाभ प्राप्त करने की स्थिति सामान्यतया सुखद होती है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के लाभ और लक्ष्य का माहौल स्तरीय होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने लाभ और लक्ष्य से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।

द्वादश भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो खर्चीला स्वभाव का , बाहरी स्थान से संबंध बनाकर रखनेवाला होता है, लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के  खर्च और संबंध का स्तर काफी बड़ा होता है , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक काफी मुसीबतों और दिक्कतों के साथ खर्च चलानेवाला , बाहरी संबंध में कष्ट प्राप्त करनेवाला होता है।

(मेरी पुस्तक  गत्यात्मक  दशा पद्धति : ग्रहों का प्रभाव से उद्धृत अंश)

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