किसी भी जन्मकुंडली के विभिन्न भावों के फल से ग्रह गति का गहरा संबंध है। किसी भी भाव की भविष्यवाणी उस भाव के स्वामी या उस भाव में स्थित ग्रहों की ग्रहगति को देखकर आसानी से की जा सकती है।
प्रथम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक को सामान्यतया बहुत अच्छा स्वास्थ्य और शरीर प्राप्त होता है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक शरीर के लिए बहुत महत्वाकांक्षी होता है , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को शारीरिक कष्ट या कमजोरी का सामना करना पड़ता है।
द्वितीय भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया धनी परिवार में जन्म लेता है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक धन संपदा की बढ़ोत्तरी के लिए बहुत महत्वाकांक्षी होता है , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को आर्थिक कष्ट या कमजोरी का सामना करना पड़ता है।
तृतीय भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया भाई.बहन से अच्छे संबंध रखता है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के भाई.बहन महत्वपूर्ण स्थान पर होते हैं , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को भाई.बहन से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
चतुर्थ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया माता से अच्छे संबंध रखता है, सुख आर स्थायित्व देनेवाले हर साधन उसके पास मौजूद रहते हैं। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति dा सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रचुर संपत्ति होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को माता और संपत्ति से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
पंचम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया संतान से अच्छे संबंध रखता है, दिमाग के तेज होने से वे और उनके संतान अाराम से विद्याध्ययन करते हैं।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास बुद्धि ज्ञान की प्रचुरता होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को बुद्धि-ज्ञान की और संतान पक्ष की कमजोरी से कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
षष्ठ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक किसी झंझट को दूर करने की पूरी क्षमता रखता है। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रभाव की मजबूती होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को रोग-ऋण और शत्रु की कमजोरी से कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
चतुर्थ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया माता से अच्छे संबंध रखता है, सुख आर स्थायित्व देनेवाले हर साधन उसके पास मौजूद रहते हैं। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रचुर संपत्ति होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को माता और संपत्ति से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है A
पंचम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया संतान से अच्छे संबंध रखता है, दिमाग के तेज होने से वे और उनके संतान आराम से विद्याध्ययन करते हैं।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास बुद्धि ज्ञान की प्रचुरता होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को बुद्धि-ज्ञान की और संतान पक्ष की कमजोरी से कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
षष्ठ भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक किसी झंझट को दूर करने की पूरी क्षमता रखता है। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पास प्रभाव की मजबूती होती है। , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को रोग-ऋण और शत्रु की कमजोरी से कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
सप्तम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया अपने जीवनसाथी से से अच्छे संबंध रखता है, लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो का जीवनसाथी और ससुराल पक्ष बहुत स्तरीय होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने जीवनसाथी से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
अष्टम भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक बहुत आरामदायक रूटीन से जीवनयापन करता है।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के जीवन जीने का ढंग सुव्यवस्थित होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने अस्तव्यस्त रूटीन से कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
नवम् भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक भाग्य का सहयोग प्राप्त करता है ।लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के के भाग्य धर्म आदि चिंतन के विषय होते हैं, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक अपने भाग्य से कष्ट का सामना करने के कारण अंधविश्वासी हो जाता है
दशम् भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक सामान्यतया अपने पिता से अच्छे संबंध रखता है,उसे अपने स्तर और रूचि के अनुरूप नौकरी प्राप्त होती है। लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के पिता और पद प्रतिष्ठा का माहौल स्तरीय होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने पिता और पद प्रतिष्ठा से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
एकादश भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो जातक के लाभ प्राप्त करने की स्थिति सामान्यतया सुखद होती है , लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के लाभ और लक्ष्य का माहौल स्तरीय होता है, इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक को अपने लाभ और लक्ष्य से संबंधित कष्ट का सामना करने को विवश होना पड़ता है।
द्वादश भाव का स्वामी या उसमें स्थित ग्रह यदि शीघ्री और सकारात्मक हो , तो खर्चीला स्वभाव का , बाहरी स्थान से संबंध बनाकर रखनेवाला होता है, लेकिन ग्रह यदि सामान्य और मंद गति का सकारात्मक हो , तो जातक के खर्च और संबंध का स्तर काफी बड़ा होता है , इन दोनों से विपरीत ग्रह वक्री और ऋणात्मक हो , तो जातक काफी मुसीबतों और दिक्कतों के साथ खर्च चलानेवाला , बाहरी संबंध में कष्ट प्राप्त करनेवाला होता है।



