प्रश्न-.हैदराबाद से श्री उमेश कुमार पूछते हैं कि सौरमंडल में सूर्य तारा है, पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष.शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी का महत्व कैसे हो सकता है ?
उत्तर — एक ही व्यक्ति सरकार के लिए नागरिक , डाॅक्टर के लिए मरीज , सामान बेचनेवाले के लिए ग्राहक , सेवा बेचनेवाले के लिए क्लाइंट और गाड़ीवाले के लिए सवारी कहे जाते हैं। भिन्न-भिन्न विज्ञान में भी एक ही शब्द का अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकता हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में विभक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। किन्तु फलित ज्योतिष.शास्त्र पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी, उसके जड़-चेतन और मानव-जीवन पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह कहा जाता है। ग्रहों की ज्योतिष.शास्त्र में यही परिभाषा मानी जा सकती है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।



