तीन.चार दिनों पहले श्री विद्यासागर महथा नाम के एक 69 वर्षीय सज्जन ने चिट्ठा लिखना आरंभ किया है। उनके चिटठे का नाम है-.फलित ज्योतिष : सच या झूठ । इन्होने अपना सारा जीवन ज्योतिष के विकास में समर्पित कर दिया , पर अपने रिसर्च को पहचान दिला पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। उनका लक्ष्य इस चिट्ठे के द्वारा समाज में ज्योतिष और धर्म के नाम पर प्रचलित भ्रांतियों को दूर कर ज्योतिष को एक विज्ञान का दर्जा दिलाना है। इसमें ये कहां तक सफलता प्राप्त कर सकेंगे , यह तो समय के साथ ही मालूम हो सकेगा ,पर अभी शायद ये हिन्दी चिट्ठाकार भाई.बहनों में सर्वाधिक उम्र के या उनमें से एक माने जा सकते हैं। इनके अंदर के दर्द को इनके चिटठे में लिखे परिचय से महसूस किया जा सकता है—.
आज से पांच दशक पूर्व विज्ञान में स्नातक और हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद युवावस्था में नौकरी में हर जगह विपरीत परिस्थितियों को देखकर प्रारब्ध पर विश्वास हुआ। ज्योतिष का अधययन किया ,इसके गणित क्षेत्र से खासा प्रभावित हुआ,पर फलित पक्ष में निराशा ही हाथ लगी। इसी कारण आलोचनात्मक ढंग से ज्योतिष की पत्र.पत्रिकाओं में मेरा प्रवेश हुआ, पर निरंतर अध्ययन से धीरे.धीरे इसमें वैज्ञानिक तथ्य भी दिखाई पड़ते गए। ज्योतिष की कमजोरियों को दूर करने और इसे विज्ञान का दर्जा देने में 40 वर्षों तक अपनी जिंदगी भी ढंग से नहीं जी पाया,ज्योतिष की कमियों का विश्लेषण करने के कारण ज्योतिष प्रेमियों से सहयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी , कार्यक्षेत्र ज्योतिष होने के कारण वैज्ञानिक वर्ग का भी सहयोग नहीं मिल पा रहा है। मेरे द्वारा ज्योतिष में जो रिसर्च किया गया,उसके आधार पर आप किसी के जन्मतिथि,जन्मसमय और जन्मस्थान के आधार पर उसके पूरे जीवन के उतार.चढ़ाव और सुख.दुख का के लेखाचित्र के साथ.साथ अन्य कई प्रकार के लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। मुझे आंतरिक सुख देने के लिए इतनी सफलता काफी है,पर सांसारिक दृष्टि से देखा जाए,मुझे इस बात का अफसोस ही रहेगा कि आखिर मैने अपने मस्तिष्क का उपयोग फलित ज्योतिष के ही क्षेत्र में क्यों किया,अन्यत्र क्यों नहीं ?
अंत में मै बतला दूं कि श्री विद्यासागर महथाजी मेरे पिताजी हैं ,जिन्होने अपनी हालत को देखते हुए कभी नहीं चाहा था कि मैं भी इस क्षेत्र में आऊं। पर इसके प्रति मेरी रूचि ने मुझे इस क्षेत्र में खींच ही लिया। मैने पिछले वर्ष ही चिटठा लिखना आरंभ किया है। इस मध्य एक सवा महीने उनके पास रहने का मौका मिला, मैने तो उनसे बहुत कुछ सीखा ही बदले में उन्हें भी चिटठा लिखने को प्रेरित किया। इस क्षेत्र में उन्हें लाकर मैं काफी खुश हूं ,क्योंकि मैं जानती हूं कि वह दिन कभी न कभी तो आएगा ,जब हमें अपना लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।




स्वागत एवं अभिनन्दन है पिता जी का.
स्वागत है.
अष्टकवर्ग, केपी, गत्यात्मक, सिस्टम्स अप्रोच, होररी – प्रश्न ज्योतिष, या अन्य ढेरों वैदिक और पश्चिमी रीतियों के अलावा लाल किताब जैसी पुस्तकों में ज्योतिष बिखरा पडा है. मान लिया की सबने जीवन-झोंक मेहनत की, सीखा और सिखाया.
लग्न तय करने से ले कर दशाएं और बल गिनने, भविष्यवाचन की इतनी अलग अलग विधियां, एक आम पाठक या जातक तो बौरा ही जाता है की ये क्या हो रहा है. नौ ग्रह बारह घर और इतना घमासान! मेरे जैसे तो पहले कुछ पाठ पढ कर ही भाग खडे होते हैं, की हर विधी किसी पुरातन विधी का कुछ आसान करती करती स्वयं जटिल हो जाती लगती है. सभी के अपने अपने क्लेम्स हैं.
हिंदी ब्लाग जगत में ही पांच चिट्ठे हैं – हर चिट्ठा व्यवहारिक मदद या ज्योतिष सिखाने से ज्यादा आम-जन में उसकी छवि को सुधारने के लिये अधिक काम करता दिखता है. यह अच्छी शुरुआत तो है. आशा है सच्ची और ठोस शोध सामने आए, और साईट एक आदर्श शिक्षा स्थल दिखे. शुभकामनाएं.
Aap badhai ki patra hain. aasha karta hun jo bida aapne uthaya hai usmen sabhi jyotishpremiyon ki hardik shubhkama aapke sath hongi. SAFALTA AAPKE KADMON MAIN HO YAHI MANGALKAMNA KARTA HUN.
Mai to bhavuk ho gaya hoon ese padhkar…ye to Bhagirath sa prayash hai…ek vidha ke liye etna bara samarpan ek parivar ke dwara…Ab to es Himalya se ganga nikalni hi chahiye….Mai yahi kamana karta hoon…