क्या भारतीय नेता अंधविश्वासी होते जा रहे हैं ?

पत्रिकाओं में पढ़ने को मिला कि भारत के अधिकांश नेता अंधविश्वासी होते जा रहे हैं , जिन्हें देखकर वैज्ञानिकों को बहुत चिंता हो रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार वे समाज को जो संदेश दे रहे हैं , उससे समाज के अन्य लोगों के भी अंधविश्वासी बन जाने की संभावना है। मैनें पढ़ा , तो अचंभा हुआ , नेता और अंधविश्वासी ? अरे अंधविश्वास तो गरीबों , निरीहों और असहायों का विश्वास है , जो उन्हें जीने की शक्ति देता है। अधिकांश रिक्शाचालक मौका मिलने पर भी यात्री का सामान लेकर चंपत नहीं होते। अधिकांश नौकर मालिक की एक अठन्नी का भी स्पर्श  नहीं करते। अधिकांश नौकरानियॉ अपने अय्याश मालिक के द्वारा दिए गए लालच को ठुकरा देती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका दिमाग अंधविश्वासी है और वे अगले जन्म में मिलनेवाले फल के भय से उपरोक्त पापों को अंजाम न देने को कृतसंकल्प हैं। वे न सिर्फ अपने हक की कमाई से ही जीने की सामर्थ्य  रखते हैं , वरन् अपनी छोटी-मोटी उपलिब्घयों से ही खुश होकर अपने समर्थ्यानुसार ढाई , पॉच या ग्यारह रुपए का चढावा लेकर निर्मल मन से मंदिर में पहुंच जाते हैं। इनकी तुलना भला नेताओं से की जा सकती है ? नेताओं को न तो अपने क्षेत्र की जनता के लिए कुछ काम करने की चिंता है और न ही उनके पैसों का घोटाला करने पर भय। लूट-मार-हत्या तो इनकी आगे बढ़ने की सीढ़ी ही हैं। इनका दामन थामें बिना वे तो वे तरक्की ही नहीं कर सकते। इन पापों को करते वक्त वे अगले जन्म की क्या ,अगले चुनाव तक की चिंता नहीं करते। अनुचित ढंग से हासिल किए गए असीमित पैसों की बदौलत वे पुन: भगवान का आशीर्वाद , जनता की मुहब्बत और अपनी गद्दी सबकुछ प्राप्त कर लेने का दुस्साहस रखते हैं। वैज्ञानिक भले ही चिंतित हों कि नेताओं के ज्योतिष , धर्म और अन्य अंधविश्वासों के प्रति रुचि के उपस्थित होने से जनसामान्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है , पर मै आश्वस्त हूं , इन नेताओं के कर्मों से समाज की सोंच का क्षेत्र व्यापक हो रहा है।

ज्योतिष में राजयोग

राजयोगों की विवेचना या उल्लेख करते हुए सामान्यतया ज्योतिषी या ज्योतिषप्रेमी अपने मस्तिष्क मे भावी उपलब्धियों की बहुत बड़ी तस्वीर खींच लेने की भूल करते हैं। चूंकि आज का युग राजतंत्र का नहीं है , कई लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि राजयोग का जातक मंत्री , राज्यपाल , राष्ट्रपति , कमांडर , जनप्रतिनिधि या टाटा ,बिड़ला जैसी कम्पनियों का मालिक होना है। लेकिन जब इस प्रकार के योगों की प्राप्ति बहुत अधिक दिखलाई पड़ने लगी , यानि राजयोगवाली बहुत सारी कुंडलियॉ देखने को मिलने लगीं , तो ज्योतिषी फलित कहते वक्त कुछ समझौता करने लगे और राजयोग का अर्थ गजेटेड अफसरो से जोड़ने लगें। हैं। जिस राजयोगमें  एक राजा को पैदा होना चाहिए , उसमें एक मामूली दुकानदार पैदा हो जाता है और जब श्रीमती इंदिरा गॉधी जैसे सर्वगुणसंपन्न प्रधानमंत्री की कुंडली की व्याख्या करने का अवसर मिलता है , तो बड़े से बड़े ज्योतिषी उनकी कुंडली में बुधादित्य राजयोग ही उनके प्रघानमंत्री बनने का कारण बताते हैं , जबकि संभावनावाद के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की कुंडली में बुधादित्य योग के होने की संभावना होती है। एक महान ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक में लिखा है , बुधादित्य योग यद्यपि प्राय: सभी कुंडलियों में पाया जाता है , फिर भी इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इस तरह राजयोगों का विश्लेषण क्या असमंजस में डालनेवाला पेचीदा , अस्पष्ट और भ्रामक नहीं है ? इस तरह के पेचीदे वाक्य राजयोग के विषय में ही नहीं , वरन् ज्योतिष के समस्त नियमों के प्रति बुिद्धजीवी वर्ग की जो धारणा बनती है , उससे फलित ज्योतिष का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई पड़ता है।

                               आज कम्प्यूटर का जमाना है , अपने समस्त ज्योतिषीय नियमों , सिद्धांतो को कम्प्यूटर में डालकर देखा जाए , कुंडली निर्माण से संबंधित गणित भाग का काम संतोषजनक है , परंतु फलित भाग बिल्कुल ही स्थूल पड़ जाता है , इससे किसी को संतुष्टि नहीं मिल पाती है। एक मामूली प्रथमिक स्कूल के शिक्षक और बसचालक की कुंडली में अनेक राजयोग निकल आते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की कुंडली में एक दरिद्र योग का उल्लेख इस तरह होता है , मानो वह अति विशिष्ट व्यक्ति न होकर भिखारी हो।

(श्री विद्यासागर महथाजी द्वारा लिखित `फलित ज्योतिष : कितना सच कितना झूठ´ की पांडुलिपि से उद्धृत)

यात्राएँ और सप्ताह के दिन

सप्ताह के सभी दिनों का ग्रहों से कोई लेना देना ही नहीं हैं , यह बात पिछले अध्याय में ही समझायी जा चुकी है। तब यात्रा के संबंध में विधि-निषेध से संबंधित ज्योतिषीय नियमों में भी सवालिया निशान लग जाता है। ज्योतिष ग्रंथों में लिखा है——-

सोम शनिश्चर पूरब न चालू।मंगल बुध उत्तर दििश कालू।

यानि सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा में नहीं जाना चाहिए , किन्तु सब लोग इस बात से भिज्ञ हैं कि प्रत्येक दिन की तरह सोमवार और शनिवार को पूरब दिशा से चलनेवाली गाडि़यों की संख्या उतनी ही होती है , जितनी अन्य दिनों में। यदि सोमवार , शनिवार को पूरब दिशा से चलनेवाली हजारों गाडि़यों में से कोई एक कभी दुर्घटनाग्रस्त हो भी जाती है तो इस प्रकार की बात पूरब से चलनेवाली गाड़ी में भी शुक्रवार को देखी जा सकती है। इसलिए इस बात की  पुष्टि नहीं  हो पाती है कि निश्चित तौर पर सोमवार , शनिवार को पूरब की ओर चलनेवाली सभी गाडि़यों को सुरक्षा की दृष्टि से  रोक दिया जाए या मंगलवार , बुधवार को उत्तर दिशा में कोई गाड़ी नहीं चलने दी जाए। वास्तव में ज्योतिष शास्त्र में उल्लिखित ये सारे नियम बिना वजह भय और संशय उत्पन्न करनेवाले हैं। इन नियमों की अवैज्ञानिकता से ही फलित ज्योतिष अविश्वसनीय बना हुआ है। इन अंधविश्वासों को हम हजारो वर्षों से ढोते आ रहें हैं। आज के वैज्ञानिक युग में इस प्रकार की बातें आम लोगों के बीच कौतुहल , हास्य और व्यंग्य का कारण बनतीं हैं। इन नियमों को मानने के लिए कोई तैयार नहीं है। किन्तु ज्योतिषी बंधुओं को इस प्रकार की कमजोरियों को भी स्वीकार करने में हिचकिचाहट है। अब तक ज्योतिष के जिस स्वरुप को उभारा गया है , उससे आम आदमी संकट के समय ग्रहों के भय से भयभीत होते है । जिस दिन ज्योतिष के वैज्ञानिक स्वरुप को वे जान जाएंगे , वे निडर और निश्चिंत दिखाई पड़ेंगे।

 (श्री विद्यासागर महथाजी द्वारा लिखित `फलित ज्योतिष : कितना सच कितना झूठ´ की पांडुलिपि से उद्धृत)

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 34 other followers