ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने में दान-धर्म

ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए दान-धर्म की भूमिका अहम् होती है। जब गंभीरतापूर्वक इसपर अध्ययन किया गया, तो निम्न बातें दृिष्टगोचर हुई———–

1. चंद्रमा कमजोर हो, तो जातक अनाथाश्रम को दान देकर तथा अनाथो को हर प्रकार का सुख पहुंचाकर चंद्रमा के बुरे प्रभाव को कम कर सकते हैं। 12 वषZ से कम उम्र की कन्याओं की पूजा करने के पीछे भी यही कारण हो सकता है। सफेद या संतरेे के रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करें।

2. बुध ग्रह कमजोर हो, तो जातक विद्यार्थियों को अनुदान या िशक्षण-संस्थाओं को दान देकर तथा उन्हें हर संभव सहायता कर बुध के बुरे प्रभाव को कम कर सकते हैं। हरे रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करें।

3. मंगल कमजोर हो, तो उन्हें रोजगार के लिए संघषZ कर रहे युवक-युवति को मदद करना चाहिए। इससे मंगल का बुरा प्रभाव काफी हद तक दूर होगा। लाल रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करें।

4. शुक्र कमजोर हो, तो उन्हें विवाह-योग्य वर और कन्याओं के विवाह में सहायता करनी चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि उस विवाह से दोनो ही पक्षों को फायदा हो रहा हो। इससे शुक्र को बुरा प्रभाव काफी कम होगा। हल्के नीले रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करें।

5. सूर्य कमजोर हो, तो उन्हें अपनी गृहस्थी को खींच पाने में कमजोर पड़ रहे लोगों की मदद करनी चाहिए। इस उम्र में हर व्यक्ति की जवाबदेही बढ़ जाती है और बहुतों के लिए यह समय भारी हो जाता है। वैसे लोगों की मदद कर आप अपने सूर्य के बुरे प्रभाव को कम कर सकते हैं। ईंट के रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करें।

6. बृहस्पति कमजोर हो, तो आपकोें अपने माता-पिता की विशेष सेवा करनी चाहिए। अपने सभी गुरुओं, जिससे छोटा या बड़ाकिसी भी तरह का ज्ञान आपने प्राप्त किया है, उसके लिए उनका शक्रगुजार होना चाहिए । साथ ही यदि वे आपको कोई आज्ञा दें, तो उनका पालन करना चाहिए। इससे आपके उपर पड़नेवाला बृहस्पति का बुरा प्रभाव कम होगा। पीले रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करें।

7. शनि कमजोर हो, तो आपको अतिवृद्धों के प्रति अधिक जवाबदेह होना होगा। वृद्धाश्रमों को अनुदान देकर, उनकी देखभाल में योगदान कर तथा उनकी समस्याओं को समझकर आप खुद पर पड़नेवाले शनि के बुरे प्रभाव को कम कर सकते हैं। काले रंग की वस्तु का भूलकर भी दान न करेंA

(मेरे द्वारा लिखित `गत्यात्मक झरोखे से ज्योतिष´ की पांडुलिपि से उद्धृत)

ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में रंगों की भूमिका

संपूर्ण संसार रंगमय है। रंगों में अद्भुत प्रभाव होता है।

चंद्रमा से दूधिया सफेद , बुध से हरा ,मंगल से लाल , शुक्र से चमकीला सफेद , बृहस्पति से पीला , शनि से काला रंग तथा सूर्य से तप्त लाल रंग की किरणे निकलकर पृथ्वी के जड़-चेतन पर अपना प्रभाव डालती है। सर्वविदित तथ्य यह है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। इसी कारण चंद्रमा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। शायद यही कारण है कि हमारे समाज की नवविवाहित स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मांग में लाल सिंदूर लगाने की प्रथा है। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ बुरे ग्रहों के लिए ही किया जाना चाहिए , अच्छे ग्रहों के लिए नहीं। कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।   

             गत्यात्मक ज्योतिष भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। रत्न धारण के साथ साथ आप उसी रंग की प्रधानता के वस्त्र धारण कर सकते हैं । मकान के बाहरी दीवारों की पुताई करवा सकते हैं । यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हेंसफेद ,बुध कमजोर हो , तो उन्हें  हरे , मंगल कमजोर हो , तो उन्हें लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उन्हें हल्के नीले  , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित कर देना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। उन रंगों की वस्तुओं का प्रयोग न कर आप उनका दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है।
(गत्यात्मक झरोखे से ज्योतिषनामक पाण्डुलिपि से उद्धृत अंश )

ग्रहों के बुरे प्रभाव के निराकरण के गत्यात्मक उपाय

युगों-युगों से मनुष्य अपने समक्ष उपस्थित होनेवाली समस्याओं के कारणों की जानकारी और उसके समाधान के लिए चिंतन-मनन करता रहा है। मानव-मन के चिंतन मनन के फलस्वरुप ही नाना प्रकार के उपचारों के विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पतियों से ही सब प्रकार के रोगों का उपचार संभव है , उनकी पद्धति नेचरोपैथी कहलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जल ही जीवन है और इसके द्वारा ही सब प्रकार के रोगों का निदान संभव है। एक अलग वर्ग का मानना है कि विभिन्न प्रकार के योग और व्यायाम का भी मानव स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। कुछ ऋषि-मुनियों का मानना है कि वातावरण को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने में समय-समय पर होनेवाले यज्ञ हवन की भी बड़ी भूमिका होती है। सतत् विकास के क्रम में इसी प्रकार आयुर्वेद , होम्योपैथी , एक्यूपंक्चर , एक्यूप्रेशर , एलोपैथी की भी खोज हुई।

                               फलित ज्योतिष मानता है कि मनुष्य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शरीरिक , मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का मुख्य कारण उसके जन्मकाल के किसी कमजोर ग्रह का प्रभाव है और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को दूर किया जा सकता है। इसी क्रम में विभिन्न धातुओं और रत्नों द्वारा ग्रहों के प्रभाव को कम कर रोगों का इलाज करने की परंपरा की शुरुआत हुई। पिछले बीस वर्षों से गत्यात्मक ज्योतिष भी कमजोर ग्रहों से जातकों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों की तीन मुख्य स्थितियॉ होती हैं ———–

१. सभी वक्री ग्रह कमजोर होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित कमजोर तथा निराशाजनक वातावरण प्रदान करते हैं , दुखद  फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

२. सभी शीघ्री ग्रह मजबूत होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित मजबूती तथा उत्साहजनक वातावरण प्रदान करते हैं , सुखद  फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

३. सभी सामान्य ग्रह महत्वपूर्ण होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित स्तर तथा कार्य करने का वातावरण प्रदान करते हैं , स्तरीय फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना असंभव है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए निम्न सलाह दिया जा सकता है ————–

१. जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह शीघ्री होते हैं , उन्हें लगभग जीवनभर सारे संदर्भों की सुख-सुविधा आसानी से प्राप्त होती है , जिसके कारण वे थोड़े लापरवाह स्वभाव के हो जाते हैं , अपनी पहचान बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं , इस कारण मेहनत से दूर भागते हैं। इस स्वभाव को कम करने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी पहननी चाहिए , जो उस दिन बनी हो , जब अधिकांश ग्रह सामान्य या मंद  गति के हों .

२. जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह सामान्य होते हैं , वे लगभग जीवनभर काफी महत्वाकांक्षी होते हैं , उन्हें अपनी पहचान बननने की दृढ़ इच्छा होती है , जिसके कारण ये सतत् प्रयत्नशील होते हैं , वैसे तो वर्तमान युग में ऐसे व्यक्तित्व का काफी महत्व है , किन्तु यदि ग्रह ऋणात्मक हो और फल प्राप्ति में कुछ विलम्ब की संभावना हो तो वे ऐसी अंगूठी पहनकर कुछ  आराम कर सकते हैं , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

३. जिन जातकों के अधिकांश ग्रह वक्री हों , उन्हें लगभग जीवनभ्र काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है , निरंतर निराशाजनक परिस्थितियों में जीने के कारण वे काफी कुंठित हो जाते हैं। इन परिस्थितियों को कुछ सहज बनाने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी दी जा सकती है , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों। 

                        ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त में बनवायी जा सकती हैं , जब उन ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो , जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

(मेरे द्वारा लिखित `गत्यात्मक झरोखे से ज्योतिष´ की पांडुलिपि से उद्धृत)

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 34 other followers