जन्मकुंडली बनाम् कर्मकुंडली

                  

                    किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली और कर्मकुंडली में बड़ा अंतर होता है। जहां जन्मकुंडली को निश्चित करने में जातक के जन्म के समय भचक्र के विभिन्न कोणों पर स्थित ग्रहों की भूमिका होती है , वहीं कर्मकुंडली को निश्चित करने में जातक के भौगोलिक परिवेश के साथ.साथ युग के परिवर्तन का भी प्रभाव होता है। जन्मकुंडली सांकेतिक तौर पर ही सही , पूरे जीवन की परिस्थितियों का विश्लेषण करती है , जबकि कर्मकुंडली वास्तविक तौर पर , लेकिन सिर्फ भूत और वर्तमान तक का। जातक के लिए जन्मकुंडली निश्चित् होती है , जबकि कर्मकुंडली अनिश्चित। जहां जन्मकुंडली को निश्चित करने में जातक की परिस्थितियां जिम्मेदार होता है , वहीं कर्मकुंडली को निश्चित करने में सामाजिक ,पारिवारिक , राजनीतिक , धार्मिक और आर्थिक वातावरण के साथ.साथ व्यक्ति खुद भी जिम्मेदार होता है। जन्मकुंडली के अनुसार जातक की रूचि होती है , जबकि कर्मकुंडली के अनुसार जातक का खान.पान और  रहन.सहन। जन्मकुंडली से व्यक्ति के स्वभाव का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से व्यवहार का। जन्मकुंडली से स्वास्थ्य का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से शरीर के वजन का। जन्मकुंडली से धन के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से धन की मात्रा का। जन्मकुंडली से भाई.बहन ,बंधु.बांधव से संबंध का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से भाई.बहन ,बंधु.बांधव की संख्या का। जन्मकुंडली से माता के सुख और उनसे मिलनेवाले सहयोग का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से माता के पद और उनकी स्थिति का। जन्मकुंडली से हर प्रकार की संपत्ति से मिलनेवाले सुख या दुख का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से हर प्रकार की संपत्ति के स्तर का। जन्मकुंडली से दिमाग की क्रियाशीलता और एकाग्रता का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से दिमाग की मजबूती और विविध प्रकार की डिग्रियों का। जन्मकुंडली से विविध प्रकार के रोगों से लड़ने की शक्ति या रोगग्रस्तता का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से बीमारियों के नाम का। जन्मकुंडली से ऋणग्रस्तता के होने या न होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से ऋण की मात्रा का। जन्मकुंडली से दाम्पत्य जीवन के सुखमय या दुखमय होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से विवाह की उम्र या पार्टनर के कद.काठी और पद का। जन्मकुंडली से जीवनशैली के सुखमय या दुखमय होने या जीवनी शक्ति का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से जीवन जीने के स्तर या जातक की उम्र का। जन्मकुंडली से भाग्य या धर्म के प्रति सोंच या नजरिए का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से किसी धर्म को अपनाने का । जन्मकुंडली से रूचि और स्तर के अनुरूप कैरियर के होने या न होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से कैरियर की शाखा या पद का ।  जन्मकुंडली से अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहने या न रहने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से लक्ष्य के स्तर का। जन्मकुंडली से अपने खर्च के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से खर्च कर पाने की मात्रा का। जन्मकुंडली से बाहरी स्थान में सफलता मिलने या न मिलने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से बाहरी स्थान में जा पाने या न जा पाने का। जन्मकुंडली से भविष्य के छोटे से छोटे समयांतराल के बारे में सांकेतिक ही सही ,जानकारी प्राप्त की जा सकती है , किन्तु कर्मकुंडली में भविष्य बिल्कुल अनिश्चित होता है  , कहा जाए कि सामने अंधेरा सा छाया होता है , तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जन्मकुंडली देखकर हम ज्योतिषी जन्मकुंडली पर आधारित प्रश्नों के सांकेतिक ही सही , पर भूत , वर्तमान और भविष्य के हर प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं , कर्मकुंडली पर आधारित प्रश्न पूछकर एक ज्योतिषी की योग्यता या ज्योतिष-शास्त्र पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित नहीं है।

पूर्व वृद्धावस्था का प्रतीक ग्रहःबृहस्पति

दया , धर्म , न्याय आदि गुणों से युक्त बृहस्पति की स्थिति सौरमंडल में सूर्य या पृथवी से बहुत ही दूर स्थित है और इस कारण प्राचीन फलित ज्यैतिष की पुस्तकों में बृहस्पति को वृद्ध ग्रह माना गया है। गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार भी मनुष्य के जीवन में बृहस्पति का प्रभाव 60 वर्य की उम्र के पश्चात ही देखा गया है। सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद यदि किसी ग्रह का प्रभाव मानवजीवन पर पड़ता है , तो वह बृहस्पति ही है। बृहस्पति की शक्ति का आकलण हम सूर्य से इसकी कोणात्मक दूरी के आधार पर कर सकते हैं। बृहस्पति सूर्य से साथ.साथ हो , तो बृहस्पति मजबूत स्थिति में होता है। सू्रय से 0 डिग्री की कोणात्मक दूरी पर बृहस्पति की कोणात्मक दूरी सर्वाधिक होती है। इस समय बृहस्पति पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी पर यानि 93 करोड़ किमी की दूरी पर स्थित होता है। सूर्य से 90 डिग्री की दूरी पर स्थित बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति सामान्य होती है , इस समय बृहस्पति पृथ्वी से औसत दूरी पर यानि 80 करोड़ किमी की दूरी पर स्थित होता है। किन्तु जैसे जैसे बृहस्पति की कोणात्मक दूरी सूर्य से बढ़ती जाती है , यह कमजोर होता जाता है , जैसs ही बृहस्पति की कोणात्मक दूरी सू्रय से 180 डिग्री की होती है , बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति शून्य हो जाती है। इस समय बृहस्पति पृथ्वी से बहुत नजदीक यानि लगभग 63 करैड़ किमी की दूरी पर आ जाता है। जिन जातकों का बृहस्पति मजबूत होता है , वे 60 वर्ष की उम्र के पश्चात सुख और सफलता प्राप्त करते हैं एविपरीत स्थिति में 60 वर्ष की उम्र के बाद उन्हें कष्ट झेलने को विवश होना पड़ता है। बृहस्पति जिस.जिस भाव का स्वामी हो , जिस भाव में स्थित हो , वह राशि और उसके राशिश के दूसरे भाव तथा जिन ग्रहों के साथ या निकट स्थित होता है , उन राशियों पर प्रभाव डालता है। विशेषकर 65वे.66वे वर्ष में बृहस्पति का अधिक प्रभाव पड़ते देखा जा सकता है। पं जवाहरलाल नेहरू 14.11.1889, कर्क लग्न के जीवन में 60 वर्ष की उम्र से 72 वर्ष की उम्र तक यानि 1948 से 1961 तक के सफल होने का कारण बृहस्पति का सू्रय से निकट स्थित होकर गत्यात्मक शक्ति सपन्न होना ही था। भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी 17.04.1927 , मेष लग्न के जीवन में भी मजबूत बहस्पति का प्रभाव देखा जा सकता है , जबकि इंदिराजी की जन्मकुंडली में सूर्य से 170 डिग्री की दूरी पर स्थित बृहस्पति के कारण उन्हें 60 वर्ष की उम्र के पश्चात् यानि 1977 के पश्चात मुसीबतें झेलने को बाध्य होना पड़ा। 1977 में चुनाव में असफलता प्राप्त की , 1980 में संजय गांधी को खोया , प्रधानमंत्री का पद मिलने के बाद भी कड़ी चुनोतियों का सामना करने को विवश हुईं और 1984 में गोलियों का शिकार बनीं। श्री अर्जुन सिंहजी की जन्मकुंडली में सूर्य से 120 डिग्री की दूरी पर स्थित बृहस्पति के कमजोर होने से उन्होनें 1996 से 2002 तक असफलता प्राप्त की।

उत्तर.प्रौढ़ावस्था का प्रतीक ग्रहःसूर्य

सूर्य सौरमंडल का आधार है। यूं तो सौरमंडल में सूर्य स्थिर है और अन्य सभी ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं , किन्तु फलित ज्योतिष में जब हम पृथ्वी को स्थिर मान लेते हैं, तो उसके सापेक्ष सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण.पथ बन जाता है, जिसमें वह प्रतिदिन 1 डिग्री के हिसाब से खिसकता हुआ एक वर्ष बाद  पुनः उसी विन्दु पर पहुंच जाता है। पूरे परिभ्रमण.काल में एक सी गति होने के कारण इससे एक सी ही उर्जा प्रवाहित होती है और इसी कारण सूर्य की गत्यात्मक शक्ति को हर वक्त सामान्य माना जाता है। सूर्य के दशाकाल में मानवजीवन पर इसके पड़नेवाले प्रभाव में अंतर सूर्य की सापेक्षिक गत्यात्मक शक्ति के अनुसार हुआ करता है। यह अंतर सूर्य जिस राशि में स्थित होता है ,उसके राशिश की शक्ति के सापेक्षिक सूर्य के कमजोर या मजबूत होने के आधार पर किया जाता है। जैसे सूर्य यदि मेष या वृष राशि में स्थित हो और मंगल सामान्य से अधिक गत्यात्मक शक्ति संपन्न हो , तो सूर्य कमजोर होता है , इसके विपरीत मंगल सामान्य से कम गत्यात्मक शक्तिसंपन्न हो , तो सूर्य मजबूत होता है।मानवजीवन पर सूर्य का प्रभाव 48 से 60 वर्ष की उम्र तक दिखाई देता है। जिनका सूर्य मजबूत होता है , इस उम्र में उस.उस भाव से संबंधित सफलता प्राप्त करते हैं , जिस.जिस भाव से सूर्य संबंधित होता है।यदि सूर्य कमजोर हो , तो जातक उन्हीं भावों से संबंधित बुरा फल प्राप्त करते हैं।सूर्य जिस.जिस राशि का स्वामी हो , जिस राशि में स्थित हो वह भाव , उसके राशिश का दूसरा भाव ,जिस.जिस भाव के स्वामी के साथ या निकटतम स्थित हो ,उस भाव से संबंधित प्रभाव जातक प्राप्त करता है। विशेषकर 54वां.55वां वर्ष जातक के लिए सूर्य से संबंधित विशेष सुख या कष्ट प्रदान करनेवाला होता है। स्मृतिशेष इंदिरा गांधी (19.11.1917 ,सिंह लग्न) के 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र तक यानि 1966 से 1977 तक बिना परिवर्तन प्रधानमंत्री के पद पर डटे होने का कारण इनका मंगल की राशि में सुर्य का सकारात्मक रूप से मजबूत होना ही था। स्मृतिशेष जाॅन मेजर (29.03.1943 , मकर लग्न) के जीवन में भी इनके सकारात्मक सूर्य का प्रभाव हम देख सकते हैं। इस के विपरीत स्मृतिशेष जेड ए भुट्टो (05.01.1928 , मिथुन लग्न) तथा स्मृतिशेष ओशो रजनीश (11.12.1931 कुंभ लग्न) के जीवन में ऋणात्मक सूर्य का प्रभाव देखा जा सकता है। रजनीश के पिता की मृत्यु भी 1979 में ही हुई , जब ये 48 वर्ष के थे।h

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 34 other followers