ग्रहों के आधार पर करें अपनी विशेषताओं का उपयोग

प्रकृति ने हर व्यक्ति को कुछ न कुछ विशेषताएं दी हैं ,जिससे संबंधित उसकी रूचियां होती हैं और वह आत्मसंतुष्टि के लिए इन प्रकार के कार्यों को करना चाहता है ,पर बहुत कम लोग इतने भाग्यशाली होते हैं , जो इन कार्यों से सांसारिक सफलता प्राप्त करने में सफल हो पाते हैं क्यूंकि आवश्यक नहीं कि विज्ञान में रूचि रखनेवाला विद्यार्थी एक अभियंता का पुत्र हो ,व्यवसाय में रूचि रखनेवाला युवक व्यवसायी का पुत्र हो ,गाने में रूचि रखनेवाला एक गायक या संगीतप्रेमी का पुत्र हो , पेंटिंग में रूचि रखनेवाला एक पेंटर या कलाप्रेमी का पुत्र हो , इसी तरह साहित्य में रूचि रखनेवालों को भी कभी.कभी जीविकोपार्जन के लिए किसी और कार्य में प्रवृत्त होना पड़ता है , क्योंकि इन सबमें भविष्य में बड़ी संभावनाओं के दिखाई पड़ने के बावजूद वर्तमान जी पाना भी बहुत कठिन हो जाता है। इसी कारण अधिकांश लोगों को सांसारिक सफलता प्राप्त करने के लिए अपनी रूचियों और विशेषताओं को दरकिनार करते हुए एक अलग ही रास्ते का चुनाव करना पड़ता है , क्योंकि कभी मां.बाप की नजर में, कभी सामाजिक तो कभी सांसारिक दृष्टि से अपनी रूचियों और विशेषताओं का रास्ता असफलता का माना जाता है। युवा होने पर सांसारिक दृष्टि से सफलता प्राप्त करने के लिए हम दो प्रकार के कार्य करते हैं -पहला श्रमप्रधान होता है और दूसरा पूंजीप्रधान। श्रमप्रधान कार्यों में अपनी शारीरिक ,मानसिक या बौद्धिक विशेषताओं का किसी और के लिए प्रयोग कर उसके लिए उचित मूल्य ले लेना होता है, चाहे वह सरकारी फर्म हो या प्राइवेट। वैसे यह रास्ता काफी सुरक्षित होता है क्योंकि इसमें हर मनुष्य को अपने स्तर का पारिश्रमिक तो मिल जाता है , और अपने से वरिष्ठ लोगों के सान्निध्य में काम करने के कारण अनुभव में भी दिन.ब.दिन वृद्धि भी होती जाती है। लेकिन बड़ी तरक्की का रास्ता खुलता है , पूंजी प्रधान कार्यों से , जिसमें अपनी शारीरिक ,मानसिक या बौद्धिक विशेषताओं का अपनी पूंजी लगाकर खुद के लिए प्रयोग कर सारा लाभ खुद के लिए ले लेना होता है। यह रास्ता एक लाटरी की तरह तो असुरक्षित नहीं माना जा सकता , पर फिर भी हार.जीत की संभावना तो बनीं ही होती है। भाग्य साथ दे , तो आपका महत्व दिन.ब.दिन बढ़ता चला जाएगा और भाग्य साथ न दे , तो आप एक भंवर में फंसते भी जा सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिष की माने ,तो प्रत्येक मनुष्य के जीवन में सुख और दुख दोनो महसूस करानेवाले समय आते.जाते रहते हैं। प्रत्येक मनुष्य का जीवन सुख और दुख दोनो ही दौर से गुजरता है। प्रकृति के इस नियम को पूजा.पाठ,यज्ञ.जाप,रत्न.धारण आदि से नहीं बदला जा सकता, बल्कि अपने ग्रहों के स्वभाव को जानने से आपको लाभ पहुंच सकता है। यदि आपका समय अच्छा चल रहा हो, तो अपको पूंजीप्रधान कार्य करने की सलाह दी जा सकती है , ताकि आप अपने गुण-ज्ञान का पूरा.पूरा लाभ प्राप्त कर सकें, पर यदि समय अच्छा न चल रहा हो, तो आप के लिए श्रमप्रधान कार्य करते हुए अपनी गुण.ज्ञान का कुछ प्रतिशत ही प्राप्त करते हुए अपने अनुभव को बढ़ाते हुए जीवनयापन करना उचित होगा , ताकि सही समय आने पर आप भी पूंजीप्रधान कार्यों को कर तरक्की का बड़ा रास्ता अपने लिए खोल सकें।

त्‍यौहार के बहाने कीड़े-मकोड़े-किटाणुओं का समूल नाश

वर्षा ऋतु की समाप्ति के तुरंत बाद दीपावली ,सबसे पहले देवी लक्ष्मी का स्वागत करने के क्रम में दीपावली के नाम पर मिट्टी-चूना-रंग-रोगन से या फिर सामान्य तौर पर साफ-सफाई करके ही अपने-अपने घरद्वार को चिकना कर दिया जाता है। अगरबत्ती और धूप जलाते हुए अपने-अपने घरों को शुद्ध किया जाता है। उसके बाद दूसरे ही दिन बारी आती है — , दीए गोवर्द्धन-पूजा के नाम पर गाय-बैल और गोशाले की सफाई कर दीए क्योंकि शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ही गायों की पूजा होती है। इस पूजा के बाद मात्र तीन दिन ही बचते हैं वहॉ जाने के रास्तों के घास-फूसों को हटाते हुए घाट तक की पूरी सफाई कर दी जाती है।  अगरबत्ती और धूप जलाते हुए वहॉ मौजूद किटाणुओं और कीड़े-मकोड़े को नष्ट करने की ,, छठ-पूजा के लिए , जिसकी तैयारी के क्रम में सामूहिक कार्यक्रम के तहत् नदी और पोखर , , नदियों , तालाबों के अंदर की मिट्टी से पूजा के लिए पिंड बनाने के क्रम में इनपर जमी बरसात की मिटि्टयों को हटाते हुए नदियों को गहरा और घाट को उंचा किया जाता है। धर्म के नाम पर इस कार्यक्रम में सबका सहयोग प्राप्त होता है। छठ के दिन वहॉ भी धूप , दीप जलाकर वातावरण को शुद्ध करने का क्रम जारी रहता है। वास्तव में इन तीनों त्यौहारों का दवाब ही है कस्बे और शहर की सुंदरता बढ़ जाती है। इतने कम समय में इतने कार्यों कस्बे या शहर से बरसात के कारण हुई गंदगी का नामोनिशान ही मिट जाता है। कम से कम एक साथ कहा जाए तो सामूहिक तौर पर इतने सारे कीड़े-मकोड़े और किटाणुओं को समूल नष्ट कर पाना किसी भी स्थिति में संभव न था , जो कि हर वर्ष ,जिनके नाम पर इतनी तेजी से सफाई की जाती है और देखते ही देखते बिहार , झारखंड और आसपास के अन्य राज्यों में , जहॉ ये तीनों त्यौहार मनाए जाते हैं , पूरे गॉव , को अंजाम दे पाना कभी भी संभव न था। धीरे-धीरे आराम से सफाई होती या फिर हर जगह नहीं भी हो पाती। सभी लोग नए उत्साह से खरीफ फसलों की कटाई-गुड़ाई शुरु कर देते हैं।आज भले ही परंपरा के नाम पर होनेवाले इन त्यौहारों के लिए हम हंसें और समय न निकाल पाएं , पर वास्तव में धन्य होंगे वे महापुरुष , जिन्होनें परंपरा के नाम पर इन त्यौहारों की शुरुआत की , जिनका आज के युग में भी महत्व है! इससे यह भी साबित हो जाता है कि धर्म वास्‍तव में युग और स्‍थान के अनुरूप जीने की शैली है।   

निम्न वर्ग के बच्चे : दो और प्रकार भी

मैंने कुछ दिन पूर्व निम्न वर्ग के 6 से 12 वषZ तक की उम्र के बच्चों के जीवन-यापन के दो ढंगों का उल्लेख करते हुए एक चिटठा पोस्ट किया था। निम्न वर्ग के ही बच्चे और दो प्रकार से जीवन-यापन करते हैं। पहले वे , जो अपने पिता के पारिवारिक धंधों में उनका हाथ बंटाते हैं , जैसे दूधवाले , छोटे-छोटे किसान , छोटे-छोटे श्रमिक , या अन्य छोटे कारीगरों के बच्चे। इनका बचपन मात्र छ: वषZ की उम्र के बाद समाप्त हो जाता है। अपने ही घर में रहते हुए उनकी बाल-मजदूरों से भी बदतर स्थिति होती है। दिनभर काम करने के बाद भी अपने थके-हारे-झल्लाए माता पिता द्वारा उन्हें छोटी-छोटी गलतियों पर मार-पीट ही मिलती है। अच्छा खाना और कपड़ा भी उनके नसीब में नहीं होता , लेकिन काम करते-करते उनकी कार्यक्षमता अवश्य ही बढ़ जाती है , जो उन्हें उस परम्परागत कला या व्यवसाय को सीखने में मदद करती है। इससे उन्हें जल्दी ही स्वावलम्बी बन पाने में मदद मिलती है , जो उनके भविष्य के मार्ग को प्रशस्त करती है।
      दूसरे वे बच्चे हैं , जो निम्न स्तर से तो हैं , पर किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्थानों में निम्नस्तरीय नौकरी या किसी अन्य प्रकार के छोटे व्यवसाय से ही जुड़े होने के बावजूद उनके अभिभावक का आर्थिक-पारिवारिक स्तर अच्छा है। इसलिए अभिभावकों की ओर से उच्छृंखल जीवन जीने की उन्हें छूट मिली हुई है। घर से ही हाथ में हमेशा दस-बीस रुपए भी मिल जाते हैं , कभी मॉगकर तो कभी चोरी से। इसमें से अधिकांश बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में कोई दिलचस्पी भी नहीं होती , क्योंकि इसके लिए माहौल में प्रेरक तत्वों का अभाव होता है। साथ ही अपने स्तर के अन्य बच्चों की तुलना में ये अपने को समर्थ महसूस करते हैं। माता-पिता की व्यस्तता के कारण भी इनकी परवरिश में उच्छृंखलता आती है। इन्हें किसी से डर नहीं होता। हमेशा मनमानी करते रहते हैं। हर मौसम का हर खेल इन्हें अच्छा लगता है। उन खेलों की हर सामग्री प्राप्त करने के लिए ये जी-जान लगा देते हैं। दिनभर सड़को और गलियों में घूमने और जेब में पैसे मौजूद होने के कारण अक्सर इन्हें नशे की आदत भी लग जाती है। धीरे-धीरे ये कामचोर भी होने लगते हैं। अपने कर्तब्यों से अधिक इन्हें अपने अधिकार की चिंता रहती है। जरा सोंचिए ? इनका भविष्य क्या हो सकता है ? अभिभावक पर भारस्वरुप लदे होने को छोड़कर।

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