कादिम्बनी के मार्च 2007 के अंक में एक खबर छपी थी कि हिन्दुस्तान/सी एन एन /आई बी एन के लिए करवाया गया एक सर्वेक्षण बताता है कि दस में से 4 भारतीय खुद को बेहद धर्मपरायण मानते हैं , हमारे लिए चौंकाने वाली खबर है। वास्तव में धर्म की परिभाषा रचनेवाले कर्मकाण्डी लोगों के प्रभाव में हमारे माता पिता ,बड़े-बूढ़ों द्वारा धर्म की जो सीख दी जाती है , वह बाह्याडंबर है , जिसके अनुसार चलने मात्र से हम धार्मिक नहीं हो सकते।
धर्म उन नियमों की संहिता है , जिसके द्वारा मानव के नैतिक , सामाजिक और मानसिक मूल्यों का सही मायने में विकास होता है। हर प्रकार के उल्टे-सीधे धंधे , हेरा-फेरी , मार-पीट , गाली-गलौज को दिनभर अंजाम देने के बाद शाम को आप मंदिर में मत्था टेकें , तो आप धार्मिक नहीं हो सकते। अपने भविष्य के लिए परीक्षा-परिणामों के लिए या लाखों-करोड़ों का मुनाफा कमाने के लिए आप भगवत्-भजन करें तो आप धार्मिक नहीं हो सकते। अरे , भगवान तो प्रकृति के कण-कण में विराजमान है, हर जीव-जंतु , पेड़-पौधे , वायु-जल और प्रकृति के सारे वरदानों में भगवान व्याप्त हैं। पूजने के लिए हर पत्थर है , सिर्फ वही टुकड़ा नहीं , जो मंदिर में विराजमान है। पूजने के लिए सारे जगत की मिटि्टयॉ हैं , सिर्फ वही नहीं , जिससे मूर्तियॉ बनायी गयीं। पूजने के लिए हर जानवर है , सिर्फ वही नहीं , जिन्हें भगवान का वाहन बनाया गया। उन्हें तो मात्र प्रतीक माना गया और सबने उसे सर्वशक्तिमान समझ लिया । आपने निर्जिवों की पूजा की और सजीवों की बलि चढ़ायी। इन्हीं जगहों पर आपसे गलती हुई , अधर्म को आपने धर्म समझा और स्वयं जैसे नास्तिक को आस्तिक।
बाह्याडंबर वास्तव में धर्म का आवरण है , जो देश-काल परिस्थिति सापेक्ष होता है। वह धर्म का मूल हो ही नहीं सकता। महापुरुषों ने धर्म के मूल की रक्षा के लिए धर्म के आवरण को अनेकों बार उतार फेका है। इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि मनुष्यता हर धर्म या धर्माचरण की मूल कसौटी है और इस दृष्टि से आज हजारों में भी एक भारतीय स्वयं को धार्मिक सिद्ध नहीं कर सकता।