धर्म को गलत कैसे और क्यों समझा जाए ?

धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य व्यवहार , जिससे पूरी मानव जाति का शारीरिक , आर्थिक , मानसिक और पारिवारिक से भी अधिक नैतिक विकास हो सके , भले ही उसके लिए उन्हें थोड़ा भय , दबाब या लालच दिया जाए , लेकिन यह तो मानना ही होगा कि कोई भी विश्वास कभी ज्यादती के आधार पर नहीं हो सकती। यह सर्वदेशीय या सर्वकालिक भी नही हो सकता। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही किसी धर्म का महत्व कम हो जाए , जिस युग में इनके नियमों की संहिता तैयार होती है , यह काफी लोकप्रिय होता है। किसी देश की सभ्यता और संस्कृति मध्यम वर्ग से ही प्रभावित होती है , इस कारण मध्यम वर्ग हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए कोई वैज्ञानिक विकल्प तैयार किया जाए , तो वह इसे अपनाने को पूर्ण तैयार होता है , इसे ही धर्म कहकर पुकारा जाता है। कालांतर में इसमें कुछ ढकोसले , कुछ अंधविश्वास , कुछ तुच्छता स्वयमेव उपस्थित होते चले जाते हैं।

     आज कई संस्थाओ का लक्ष्य धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास , पुरातनपंथ , ढकोसलों को समाप्त करना है , यह तो बहुत ही अच्छी बात है , क्योंकि हमारा लक्ष्य भी यही है। लेकिन हर व्यक्ति को किसी भी मामले में एक विकल्प की तलाश रहती है। झाड़.फूंक को तब मान्यता मिलनी बंद हो गयी , जब इलाज के लिए लोगों को एक वैज्ञानिक पद्धति मिली। यदि ये संस्थाएं आज के युग के अनुरूप कुछ नियमों की संहिता तैयार करें , जो सारे मानव जाति के कल्याण के लिए हो , तो भला जनता उसे क्यो नहीं मानेगी ? दो.चार लोगों के अधार्मिक होने से युग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता , किन्तु यदि उन्हें देख सारी जनता अधर्म के राह पर चल पड़े , नैतिक विकास से अधिक महत्व अपने शारीरिक , मानसिक आर्थिक और पारिवारिक विकास को दे , तो सुख.शांति का अंत होना ही है। आनेवाले समय में मानवजाति चैन से नही जी पाएगी। ऐसे में आज भी जरूरत है धर्म की ही सही परिभाषा रचने की और उसके अनुरूप जनता से क्रियाकलापों को अंजाम दिलवाने की। यदि इसमें ये संस्थाएं कामयाब हुईं , तो मानव जाति का उत्थान निश्चित है।

       धर्म का दिखावा करनेवाले पाखंडी धोखेबाज कपटी लोगों के प्रभाव में कुछ दिनों के लिए जनता भले ही बेवकूफ बन जाए , किन्तु फिर कुछ ही दिन में उनकी पोल अवश्य ही खुल जाती है , जबकि महात्मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , स्वामी दयानंद , स्वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक , चैतन्य महाप्रभु जैसे अनेकानेक लोग धर्माचरण के द्वारा युगों.युगों तक पूजे जा रहे हैं। फिर धर्म को गलत कैसे और क्यों समझा जाए ?

फलित ज्योतिष और आध्यात्म

फलित ज्योतिष की सही जानकारी रखनेवाला कोई भी ज्योतिषी दूसरे व्यक्ति के संबंध में उसकी समस्त चारित्रिकविशेषताओं के साथ ही साथ उसके ग्रहों के प्रतिफलन-काल की सम्यक् जानकारी प्रदान कर सकता है। अत: फलित ज्योतिष आत्मज्ञानप्राप्ति का बहुत बड़ा साधन है और इसकी जानकारी के बाद उस व्यक्ति को किस तल पर रहना चाहिए , इसका उसे सही बोध हो जाता है। जीवन के किस भाग में किस प्रकार के कार्यक्रम को किस तरह निर्धारित किया जाना चाहिए , इसका सही-सही बोध भी हो जाता है। फलित ज्योतिष के रहस्य को जिसने समझ लिया , उसे भगवान के सही स्वरुप को समझ पाने में कोई कठिनाई नहीं होती। सबसे बड़ी शक्ति , उसके यांत्रिकी या प्राकृतिक नियमों पर उसे अटूट विश्वास हो जाता है। यह बात अनायास ही समझ में आ जाती है कि मनुष्य इस बड़ी शक्ति के लिए खिलौना मात्र है और उसी शक्ति से प्रेरित उसके सोंच-विचार और समस्त कार्यक्रम हैं। हर हालत में विराट शक्ति के सापेक्ष हर व्यक्ति की सफलता और असफलता है , जो नगण्य है। इस विराट शक्ति या बडे़ शक्ति को अनंतशक्तिस्वरुपा समझा जाए तो इसकी तुलना में पृथ्वी का अस्तित्व भी शून्य के बराबर है। अत: पृथ्वी पर उत्पन्न जड़-चेतन एवं चौरासी लाख योनि में उत्पन्न जीव-जंतु , मनुष्य , राक्षस और देवतासभी अस्तित्वविहीन माने जाएंगे। ये सभी अनंत शक्ति के प्रभाव से पृथ्वी की सामयिक उपज है।

                  निर्गुण , निर्विकार , इच्छारहित अनंतशक्तिस्वरुप ब्रह्म को कल्पतरु के रुप में वर्णित किया गया है। यह पारदर्शी आइने की तरह है , जहॉ अपने दृष्टिकोण के अनुरुप सर्वशक्तिमान दिखाई पड़ता है। जब कोई व्यक्ति समर्पित भावना के साथ उसे साक्षी रखकर दूसरे के हित के लिए प्रार्थना करता है , तो उसके भावनात्मक संकल्प तरंग सामनेवाले को ठीक कर देते हैं और ठीक होनेवाले के ऋणात्मक तरंग को वह स्वयं  ग्रहण कर लेता है। सच्चे मन से की गयी प्रार्थना दूसरे का कल्याण करती है , किसी भी व्यक्ति के अंत:करण को निर्मल और स्वच्छ बना सकती है , किन्तु आध्यात्मिक जगत के इस गंभीर मंद-मंद क्रिया और भावनात्मक तरंगों का विपर्यय का उपयोग व्यावहारिक जगत में केवल जनसामान्य के लिए मनोवैज्ञानिक ही होगा। बुरे समय में भगवान भले ही याद आ जाएं , किन्तु वह उस समय अपनी मुसीबतों छुटकारा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता है , वह इस प्रार्थना से अपनी मुसीबतों से छुटकारा नहीं पाता है , किन्तु पश्चाताप करके अपने अंत:करण की शुद्धि करने में उसे सफलता मिल ही जाती है।

(श्री विद्यासागर महथाजी द्वारा लिखित `फलित ज्योतिष : कितना सच कितना झूठ´ की पांडुलिपि से उद्धृत)

क्या भारतीय धर्मपरायण है ?

कादिम्बनी के मार्च 2007 के अंक में एक खबर छपी थी कि हिन्दुस्तान/सी एन एन /आई बी एन के लिए करवाया गया एक सर्वेक्षण बताता है कि दस में से 4 भारतीय खुद को बेहद धर्मपरायण मानते हैं , हमारे लिए चौंकाने वाली खबर है। वास्तव में धर्म की परिभाषा रचनेवाले कर्मकाण्डी लोगों के प्रभाव में हमारे माता पिता ,बड़े-बूढ़ों द्वारा धर्म की जो सीख दी जाती है , वह बाह्याडंबर है , जिसके अनुसार चलने मात्र से हम धार्मिक नहीं हो सकते।
धर्म उन नियमों की संहिता है , जिसके द्वारा मानव के नैतिक , सामाजिक और मानसिक मूल्यों का सही मायने में विकास होता है। हर प्रकार के उल्टे-सीधे धंधे , हेरा-फेरी , मार-पीट , गाली-गलौज को दिनभर अंजाम देने के बाद शाम को आप मंदिर में मत्था टेकें , तो आप धार्मिक नहीं हो सकते। अपने भविष्य के लिए परीक्षा-परिणामों के लिए या लाखों-करोड़ों का मुनाफा कमाने के लिए आप भगवत्-भजन करें तो आप धार्मिक नहीं हो सकते। अरे , भगवान तो प्रकृति के कण-कण में विराजमान है, हर जीव-जंतु , पेड़-पौधे , वायु-जल और प्रकृति के सारे वरदानों में भगवान व्याप्त हैं। पूजने के लिए हर पत्थर है , सिर्फ वही टुकड़ा नहीं , जो मंदिर में विराजमान है। पूजने के लिए सारे जगत की मिटि्टयॉ हैं , सिर्फ वही नहीं , जिससे मूर्तियॉ बनायी गयीं। पूजने के लिए हर जानवर है , सिर्फ वही नहीं , जिन्हें भगवान का वाहन बनाया गया। उन्हें तो मात्र प्रतीक माना गया और सबने उसे सर्वशक्तिमान समझ लिया । आपने निर्जिवों की पूजा की और सजीवों की बलि चढ़ायी। इन्हीं जगहों पर आपसे गलती हुई , अधर्म को आपने धर्म समझा और स्वयं जैसे नास्तिक को आस्तिक।
बाह्याडंबर वास्तव में धर्म का आवरण है , जो देश-काल परिस्थिति सापेक्ष होता है। वह धर्म का मूल हो ही नहीं सकता। महापुरुषों ने धर्म के मूल की रक्षा के लिए धर्म के आवरण को अनेकों बार उतार फेका है। इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि मनुष्यता हर धर्म या धर्माचरण की मूल कसौटी है और इस दृष्टि से आज हजारों में भी एक भारतीय स्वयं को धार्मिक सिद्ध नहीं कर सकता।

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