मेरा यह 100 वां महत्वपूर्ण पोस्ट : आप सब अवश्य पढें

(यह शोध-पत्र मेरे पिता विद्यासागर महथाजी के द्वारा नई दिल्ली में पूसा गेट के समीप राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला सभागार में 19 से 21 फरवरी 2004 को आयोजित किए गए तृतीय अखिल भारतीय विज्ञान सम्मेलन में भेजा गया था, इस सामग्री को संक्षिप्त रूप में सेमिनार के जर्नल में भी प्रकाशित भी किया गया था। इसे समझने में आप सब पाठकगणों को कुछ असुविधा अवश्य होगी, पर मेरा अनुरोध है कि आप इसे समझने की कोशिश अवश्य करें।)    

मानव-जीवन पर ग्रहों का पड़नेवाला प्रभाव अभी तक विवादास्पद विषय ही बना होता, यदि मुझे ग्रहों की शक्ति और गति के बारे में अपना 40 वर्षों की खोज में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी न हासिल हो गयी होती । परंतु आज ग्रहों की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति  निकालने के सूत्रों के प्रतिपादन एवं इसके मानव जीवन पर पड़नेवाले प्रभाव के सटीक खोज से मै इसकी विवादास्पदता को मिटा पाने में समर्थ हो चुका हूं । 

पृथ्वी को अपने परिभ्रमण-पथ के किसी बिंदू पर स्थिर मान लेने से किसी भी ग्रह की अपने परिभ्रमण-पथ के विभिन्न बिंदुओं पर सूर्य और पृथ्वी से भिन्न-भिन्न कोणिक दूरी बनती है । हर स्थिति में पृथ्वी से ग्रहों की वास्तविक दूरी में भी अंतर देखा जाता है । यही नहीं , अपने परिभ्रमण पथ के विभिन्न बिंदुओं पर ग्रहों की सापेक्षिक गति भी पृथ्वी और सूर्य से उसकी कोणिक दूरी पर निर्भर करती है । इस गति के अनुसार ही सभी ग्रह शक्ति प्राप्त करतें हैं , जिसे गत्यात्मक शक्ति कहा जा सकता है । इसी शक्ति के अनुसार ही ग्रह विभिन्न अवधि में जातक को फल प्रदान करतें हैं ।

 

MARSNEW

 

 

 

इस छोटे से शोधपत्र में सारे ग्रहों की चर्चा संभव नहीं है । इसलिए मै सिर्फ एक ग्रह मंगल की चर्चा कर रहा हूं । संलग्न चित्र में O बिंदू पर सूर्य स्थित है , ABCD पृथ्वी का परिभ्रमण पथ है ,जिसमें पृथ्वी किसी भी बिंदू पर स्थित हो सकती है । इसी तरह मंगल अपने परिभ्रमण-पथ UTVWPXQYZS के किसी भी बिंदू पर हो सकता है ।

संलग्न चित्र( यदि चित्र बडा न हो रहा हो तो <a href = “http://2.bp.blogspot.com/_umJcj5hbyeg/StRlVlzhS3I/AAAAAAAAAQQ/hf7w9fzAzIg/s1600-h/MARSNEW.JPG”>यहां</a>क्लिक करें)के अनुसार सबसे पहले मै पृथ्वी के A बिंदू पर  स्थित होने की कल्पना करना चाहूंगा । यदि सूर्य O तथा पृथ्वी A बिंदू पर स्थित हो तो X बिंदू पर मंगल की स्थिति से सूर्य , पृथ्वी और मंगल के मध्य 180 डिग्री का कोणिक दूरी बनती है । इस समय मंगल की पृथ्वी से वास्तविक दूरी भी सबसे कम होती है । पृथ्वी सापेक्ष मंगल की गति पर जब मैने ध्यान दिया तो पाया कि इस समय मंगल सर्वाधिक वक्र गति में है ।

 इसी प्रकार यदि सूर्य O तथा पृथ्वी A बिंदू पर स्थित हों तो W बिंदू पर मंगल की स्थिति से सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य लगभग 135 डिग्री का की कोणिक दूरी बनती है । इस समय मंगल से पृथ्वी की वास्तविक दूरी सामान्य से कम होती है । इस समय मंगल की सापेक्षिक गति शून्य होती है यानि न तो वह आगे बढ़ने और न ही पीछे खिसकने की ही स्थिति में होता है ।

 इसी प्रकार O बिंदू पर सूर्य ,A बिंदू पर पृथ्वी ,तथा  Z बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 90 डिग्री का कोण बनता है । इस समय मंगल पृथ्वी से सामान्य वास्तविक दूरी पर होता है और इसकी प्रतिदिन की गति भी सामान्य रुप से आगे बढनेवाली होती है ।

 O बिंदू पर सूर्य , A बिंदू पर पृथ्वी तथा U बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 0 डिग्री का कोण बनता है । इस समय मंगल से पृथ्वी की वास्तविक दूरी बहुत अधिक होती है । इसकी प्रतिदिन की गति भी सामान्य से काफी अधिक होती है ।

O बिंदू पर सूर्य A बिंदू पर पृथ्वी तथा V बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से पुन: सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 90 डिग्री का कोण बनता है । इस समय मंगल की पृथ्वी से वास्तविक दूरी पुन: सामान्य होती है । मंगल की गति भी यहॉ पर सामान्य रुप से आगे बढ़नेवाली होती है ।

O बिंदू पर सूर्य ,A बिंदू पर पृथ्वी तथा W बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से पुन: सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 135 डिग्री के आसपास का कोण बनता है । इस समय पुन: मंगल की पृथ्वी से दूरी सामान्य से कुछ कम हो जाती है  और इसकी गति शून्य यानि पृथ्वी के समानान्तर होती है ,जिसके कारण न तो वह आगे बढ़ता और न ही पीछे खिसकता दिखाई देता है ।  

पुन: X बिंदू पर वह अपनी पूर्व अवस्था को लौट आता है । मंगल की इन विभिन्न स्थितियों का मैने भिन्न-भिन्न नाम रखा है । मंगल को X स्थिति पर अतिवक्र ,Y स्थिति पर मार्गी , Z स्थिति पर आरोही समगतिशील , U स्थिति पर अतिशीघ्री , V स्थिति पर अवरोही समगतिशील तथा  W स्थिति पर वक्री माना गया है ।  

X स्थिति से Y स्थिति तक मंगल की वक्रता क्रमष: कम होती चली जाती है । Y से  Z स्थिति तक यह सामान्य गति प्राप्त करने को आगे बढ़ता है ।   Z से U तक इसकी गति काफी तेज हो जाती है । U स्थिति से V स्थिति तक उसकी गति कम होती हुई सामान्य तक पहुंचती है । V से W की स्थिति में वह सामान्य से कम गति प्राप्त करता है तथा  W से X स्थिति तक उसकी गति ऋणात्मक हो जाती है ।

X स्थिति से पुन: X स्थिति तक पहुंचने में मंगल को लगभग 26 महीने लगते हैं । X स्थिति से Y स्थिति तक लगभग 1 महीने ,Y स्थिति से   Z स्थिति तक लगभग तीन महीने ,  Z स्थिति से U स्थिति तक लगभग दस महीने  ,U स्थिति से V स्थिति तक लगभग  आठ महीने ,V से W तक तीन महीने तथा W से X तक लगभग एक महीने की यात्रा मंगल को करनी पड़ती है ।

मंगल की उपरोक्त विभिन्न स्थितियों के मानव जीवन पर भिन्न-भिन्न प्रभाव को देखने के बाद ही इसकी गत्यात्मक रहस्य को ढूंढ़ पाने में मुझे कामयाबी मिली । U स्थिति में मंगल सर्वाधिक गत्यात्मक शक्ति-संपन्न , V और  Z बिंदू पर सामान्य गत्यात्मक शक्ति-संपन्न ,  W और Y बिंदू पर सामान्य से कम गत्यात्मक शक्ति-संपन्न तथा X स्थिति में शून्य गत्यात्मक शक्ति-संपन्न होता है ।  मंगल की इस गत्यात्मक शक्ति के आकलण के लिए मैने निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया —-

गत्यात्मक शक्ति = [{(180-angular distance of sun and mars)/180}*100

मंगल युवावस्था को प्रभावित करनेवाला ग्रह है  और इसका प्रभाव मनुष्य के 24 वर्ष से 30 वर्ष की अवस्था तक अधिक पड़ता है । 30वें वर्ष में इसके प्रभाव को अधिक महसूस किया जा सकता है । मैने अपने अध्ययन में पाया कि U स्थिति के आसपास यानि  S बिंदू से T बिंदू तक के पथ पर मंगल के होने के समय जो जन्म लेते हैं , अपनी युवावस्था में काफी सहज-सुखद वातावरण प्राप्त करते हैं । V और W या Y और  Z बिंदूओं के मध्य मंगल होने के वक्त जो पृथ्वी पर जन्म लेते हैं ,अपनी युवावस्था में उनके सम्मुख दायित्वों का बोझ होता है । वे महत्वाकांक्षी होते हैं और अपनी पहचान बनाने पर विष्वास करते हैं । X बिंदू के आसपास मंगल के होने के वक्त पृथ्वी पर जन्म लेनेवाले जातक युवावस्था में निराष और कुंठित वातावरण में जीवन जीने को बाध्य होते हैं ।1978 से 1984 तक मंगल की अपने परिभ्रमण पथ के विभिन्न विंदुओं की स्थिति को चार्ट-1 द्वारा दिखाया जा सकता है ।

तालिका-1

 

year

S

U

T

V

W

X

Y

Z

1978

2  अक्तूबर 

 

 

 

 

30  जनवरी 

3  मार्च 

25  अप्रैल 

1979

 

 

16  जनवरी 

9  जून 

23  नवम्बर 

 

 

 

 

1980

 

20  नवम्बर 

 

 

 

17  जनवरी 

26 फरवरी 

8  अप्रैल 

8  जून 

1981

 

5  अप्रैल 

3  अगस्त 

27  दिसम्बर 

 

 

 

 

1982

 

 

 

 

22  फरवरी 

31  मार्च 

13  मई 

9  जुलाई 

1983

22  जनवरी 

4  जून 

12  सितम्बर 

 

 

 

 

 

1984

 

 

 

1  फरवरी 

7  अप्रैल 

10  मई 

21 जून 

30  अगस्त 

 

  जातक अपनी जन्मकालीन मंगल की गति , स्थिति और गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही अपनी युवावस्था में यानि 24 वर्ष  से 30 वर्ष की उम्र में परिस्थितियॉ प्राप्त करतें है । इस आधार पर 24 से 30 वर्ष के युवा वर्ग को तीन भागों में बॉटा जा सकता है  ।

 

 

        प्रथम  वर्ग यानि U बिंदू के आसपास यानि S से T बिंदू पर मंगल के स्थित होने के मध्य जन्म लेनेवाले जिन्हें प्रकृति नें हर प्रकार की सुख-सुविधा मुहैया करा रखी है और इनका काम सिर्फ आनंद लेना है । ये किसी बड़े काम को संभालने के लायक नहीं होते हैं ।

        द्वितीय  वर्ग यानि V से W या Z से Y बिंदूओं के मध्य मंगल के स्थित होने के वक्त जन्मलेनेवाले युवक-युवतियॉ ,जो महत्वाकांक्षी हैं , काम से नहीं घबडातें हैं और लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं । इन्हें इस अवधि में बडी-बडी जिम्मेदारियां सौंपी जाती है ।

         तृतीय  वर्ग  यानि X बिंदू के आसपास यानि P से Q बिंदू के मध्य मंगल स्थित होने के वक्त जन्मलेनेवाले युवक-युवतियॉ, जिनके सम्मुख बार-बार कठिनाइयॉ उपस्थित होती हैं , जिससे इनके आत्मविश्वास में कमी आती है । ये इस अवधि में तनावग्रस्त होते हैं । 

                   24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र के हर युवक और युवतियॉ अपने जन्मकालीन मंगल की स्थिति के अनुसार ही किसी प्रकार के कार्यक्रम बना पाते हैं।

1978 से 1984 तक जन्म लेनेवाले विश्व-भर के सभी युवाओं की चर्चा इस लेख में की जा सकती है ,क्योंकि वे अभी 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र के अंतर्गत हैं ,इसलिए वे अपनी जन्मकालीन मंगल की गत्यात्मक स्थिति के अनुसार अभी परिस्थितियॉ प्राप्त कर रहें हैं । इन युवकों के परिस्थितियों की चर्चा उनकी जन्मकालीन मंगल की गति को देखकर आसानी से की जा सकती है और इस आधार पर इन्हें तालिका-2 के अनुसार तीन वगो में इस प्रकार रखा जा सकता है ।

 

 

 

 

 

तालिका-2

प्रथम  वर्ग 

द्वितीय  वर्ग 

तृतीय  वर्ग 

निम्न समयांतराल में जन्म लेनेवाले युवक-युवतियॉ 

निम्न समयांतराल में जन्म लेनेवाले युवक-युवतियॉ 

निम्न समयांतराल में जन्म लेनेवाले युवक-युवतियॉ 

2 अक्तूबर 1978 से 9 जून 1979 तक

20 नवम्बर 1980 से 3 अगस्त 1981 तक

22 जनवरी 1983 से 12 सितम्बर 1983 तक

3 मार्च 1978 से 25 अप्रैल 1978 तक

23 नवम्बर 1979 से 17 जनवरी 1980 तक

8 अप्रैल 1980 से 8 जून 1980 तक

27 दिसमबर 1981 से 22 फरवरी 1982 तक

13 मई 1982 से 9 जुलाई 1982 तक

1 फरवरी 1984 से 7 अप्रैल 1984 तक

21 जून 1984 से 30 अगस्त 1984 तक    

1977 के अंत से 1978 के 3 मार्च तक

17 जनवरी 1980 से 8 अप्रैल 1980 तक

22 फरवरी 1982 से 13 मई 1982 तक

7 अप्रैल 1984 से 21 जून 1984 तक

 

संलग्न चित्र के अनुसार मंगल की स्थिति 2007 में 19 सितम्बर को V बिंदू पर होगी तथा 15 नवम्बर 2007 को W बिंदू पर । गोचर में जब भी मंगल अपने पथ पर V बिंदू से आगे बढ़ता है , युवा वर्ग विशेष प्रकार की घटनाओं से प्रभावित होते हैं । V से W के मध्य जब मंगल की स्थिति होती है ,तो इन तीन महीनों में जहॉ पहले वर्ग के लोग अपनी सुख-सुविधा में और इजाफा प्राप्त करतें हैं ,वहीं दूसरे वर्ग के लोग अपने लिए नए कार्यक्रम ,परंतु तीसरे वर्ग के लोगों को नई समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ता है । इस आधार पर 19 सितम्बर से 15 नवम्बर 2007 तक खास तौर पर जहॉ पहले वर्ग के जहॉ पहले वर्ग के लोगों को सुख.सुविधा में कुछ इजाफा मिला होगा , वहीं दूसरे वर्ग के लोगों ने अपने लिए नए कार्यक्रम प्राप्त किए होंगे, परंतु तीसरे वर्ग के लोगों को नई समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ा होगा।

15 नवम्बर 2007 की W विंदू से लेकर 25 दिसम्बर 2007 की X विंदू तक की मंगल की स्थिति से पहले वर्ग के लोगों के सम्मुख लाभ में कुछ कमी का अहसास होना चाहिए , दूसरे वर्ग के लोग भी छोटी मोटी बाधा उपस्थित पाए होंगे, किन्तु तीसरे वर्ग के लोग किंकर्तब्यविमूढ़ अवस्था में अपनी समस्याओं से जूझते रहे होंगे। 25 दिसम्बर 2007 की X विंदू से 1 फरवरी 2008 की Y विंदू तक की मंगल की स्थिति पहले वर्ग के लोगों सम्मुख उपस्थित लाभ की कमी को दूर करने की कोशिश में होंगी , दूसरे वर्ग के लोगों की बाधाएं भी क्रमशः दूर होती दिखाई पड़ेंगी और तीसरे वर्ग के लोग भी अंधेरे में दूर दिखाई देते रोशनी के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे ।

 

1 फरवरी 2008 की Y विंदू से 30 मार्च 2008 की Z विंदू तक की मंगल की स्थिति के कारण पुन: पहले वर्ग के लोगों का माहौल उत्साहजनक होगा, दूसरे वर्ग के लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में व्यस्त होंगे, किन्तु लाख उपायों के पश्चात भी तीसरे वर्ग के लोगों को निराशाजनक फल ही प्राप्त हो रहे होंगे ।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या ज्योतिष को विकासशील नहीं होना चाहिए ?

ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास , एक बड़ा प्रश्न , वो भी अनुत्तरित , क्योंकि इसके सही आधार की नासमझी के कारण जहां कुछ लोग इसका तिरस्कार करते हैं  , वहीं दूसरी ओर अतिशय भाग्यवादिता से ग्रसित लोग किंकर्तब्यविमूढ़ावस्था को प्राप्त कर इसका अंधानुसरण करते हैं। दोनो ही स्थितियों में फलित ज्योतिष रहस्यमय और विचित्र हो जाता है। पहले वर्ग के लोगों का कहना है कि भला करोड़ों मील दूर स्थित ग्रह हमें किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं , वहीं दूसरे वर्ग के लोगों को आकाशीय पिंड की जानकारी से कोई मतलब ही नहीं , मतलब अपने भाग्य की जानकारी से है। इस तरह मूल तथ्य की परिचर्चा के अभाव में फलित ज्योतिष को जाने अनजाने काफी नुकसान है रहा है। एक भारतीय प्राचीन विद्या को हमारे देश में उचित स्थान नहीं मिल रहा है। ज्योतिष के पक्ष और विपक्ष में बहुत सारी बातें हो चुकी हैं , सबके अपने.अपने तर्क हैं , इसलिए किसी की जीत या हार हो ही नहीं सकती। बेहतर होगा कि बुद्धिजीवी वर्ग हर प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर ज्योतिषियों की बात सुनें , उनपर विचार करें।                                                      प्रकृति के नियम के अनुसार प्रत्येक निर्माण–चाहे वह कला का हो , विज्ञान का या फिर धर्म का हो या संस्कृति का———- अविकसित , विकासशील और विकसीत तीनों ही दौर से गुजरते हैं। न सिर्फ वैयक्तिक और सामाजिक संदर्भों में ही , वरन् प्राकृतिक वस्तुओं का निर्माण भी इन तीनों ही दौर से गुजरकर ही परिपक्वता प्राप्त करता है। इस सामान्य से नियम के तहत् ज्योतिष को भी इन तीनों ही दौर से गुजरना आवश्यक था। यदि वैदिक काल में ज्योतिष के गणित पक्ष की तुलना में फलित पक्ष कुछ कमजोर रह गया था तो क्या आनेवाले दौर में इसे विकसित बनाने की चेष्टा नहीं की जानी चाहिए थी। परंतु किसी भी युग में ऐसा नहीं किया गया। ज्योतिष को अंधविश्वास समझते हुए लगभग हर युग में इसे उपेक्षित किया गया। यह कारण मेरी समझ में आजतक नहीं आया कि क्यों हमेशा से ही भूत पढ़नेवालों को विद्वान और भविष्य पढ़नेवाले को उपहास का पात्र समझा जाता रहा। आज भले ही कुछ ज्योतिषी इसे विकसीत बनाने की चेष्टा में जी.जान से लगे हों , सरकारी , अर्द्धसरकारी या गैर सरकारी  —. किसी भी संस्था का कोई सहयोग न प्राप्त कर पाते हुए लाख बाधाओं का सामना करते हुए ज्योतिष को विकासशील बनाए बिना विकसीत विज्ञान की श्रेणी में रख पाना संभव नहीं है। मै मानती हूं कि ज्योतिष विज्ञान के प्रति कुछ लोगों की न सिर्फ आस्था , वरण् भ्रांतियों को देखते हुए इसमें लाभ कमाने के इच्छुक लोगों का बहुतायत में प्रवेश अवश्य हुआ है , जिनका फलित ज्योतिष के विकास से कुछ लेना.देना नहीं है , पर उनके कारण कुछ समर्पित ज्योतिषियों के कार्य में बाधाओं का आना तो अच्छी बात नहीं है , जो कई सामाजिक भ्रांतियों को समाज से दूर करने के इच्छुक हैं।                                                 जब कुछ ज्योतिषी आस्था की बात करते हुए ज्योतिष को विज्ञान के ऊपर मान लेते हैं , यह मान लेते हें कि जहां से विज्ञान का अंत होता है , वहां से ज्योतिष आरंभ होता है , तो यह बात  बुद्धिजीवियों के गले से नहीं उतरती। वे कार्य.कारण में स्पष्ट संबंध दिखानेवाले विज्ञान की तरह ही ज्योतिष को देखना चाहते हैं। पर जब उन्हें एक विज्ञान के रूप में ज्योतिषीय तथ्यों से परिचित करवाया जाता है , तॅ वे यहां चमत्कार की उम्मीद लगा बैठते हैं। उन्हें शत्.प्रतिशत् सही भविष्यवाणी चाहिए। क्या एक डाक्टर हर मरीज का इलाज करना सिर्फ इसलिए छोड़ दे , क्योंकि वह कैंसर और एड्स के मरीजों का इलाज नहीं कर सकता  ?                                                     जब हम ज्योतिषी स्वयं यह मान रहे हैं कि ग्रह.नक्षत्रों का प्रभाव पृथ्वी के जड़.चेतन के साथ.साथ मानवजीवन पर अवश्य पड़ता है और इस प्रकार मानवजीवन को प्रभावित करने में एक बड़ा अंश विज्ञान के नियम का ही होता है , परंतु साथ ही साथ मानवजीवन को प्रभावित करनें में छोटा अंश तो सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक और देश काल परिस्थिति का भी होता है। फिर ज्योतिष की भाविष्यवाणियों के शत.प्रतिशत सही होने की बात आ ही नहीं सकती। इसी कारण आजतक ज्योतिष को अविकसित विज्ञान की श्रेणी में ही छोड़ दिया जाता रहा है , विकासशील विज्ञान की श्रेणी में भी नहीं आने दिया जाता , फिर भला यह विकसित विज्ञान किस प्रकार बन पाए  ?                                                      एक अविकसित प्रदेश के विद्यार्थी की योग्यता को जांचने के लिए आप शत्.प्रतिशत् परीक्षा परिणाम की उम्मीद करें , तो यह आपकी भूल होगी। सामान्य परीक्षा परिणाम के बावजूद वह योग्य हो सकता है , क्योंकि उसने उस परिवार और विद्यालय में अपना समय काटा है , जो साधनविहीन है। विकासशील क्षेत्र के अग्रणी विद्यालय या विकासशील परिवार के विद्यार्थी की योग्यता को आंकने के लिए आप शत.प्रतिशत परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं , क्योंकि हर साधन की मौजूदगी में उसने विद्याध्ययन किया है। ( मेरे द्वारा लिखित गत्यात्मक झरोखे से ज्योतिष की पांडुलिपि से उद्धृत  )

फलित ज्योतिष : सांकेतिक विज्ञान

पूरे विश्व में लगभग दो घंटे में पैदा होनेवाले बच्चे की संख्या 300 से अधिक होती है , जिनकी जन्मकुंडली एक जैसी होती है। लेकिन उनमें से सभी एक जैसी उंचाई हासिल नहीं करते। उंचाई हासिल करने के लिए परिस्थिति और मेहनत के साथ-साथ प्रेरक तत्वों का भी काफी महत्व है। बहुत से ज्योतिषी किसी जन्मकुंडली में राम , कृष्ण , बुद्ध , महावीर , इंदिरा गॉधी या महात्मा गॉधी जैसों की कुंडली का कोई एक योग दंखकर ही कह उठते हैं–`अरे , तुम्हारी कुंडली में तो —————योग है।´ यह ग्राहकों को खुश करने की चाल होती है। एक योग में पैदा होनेवाले सभी बच्चों में से कोई मजदूर तो कोई कलर्क , कोई ऑफिसर तो कोई व्यवसायी और कोई मंत्री के घर पैदा होता है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व-निर्माण में आर्थिक , शैक्षणिक और अन्य वातावरण ग्रह से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं .

        

बदलते युग के साथ-साथ ग्रह के प्रभाव में भी परिवर्तन होता है। यदि किसी जन्मकुंडली में मजबूत संतान पक्ष है , तो मातृ प्रधान युग के लिए तथा आज के युग में एक वेश्या के लिए लड़की का संकेतक हो सकता है , जबकि पितृप्रधान युग में वही योग लड़के की अधिकता का संकेतक होगा। यदि किसी जन्मकुंडली में मजबूत वाहन का योग है , तो वह प्राचीनकाल में घोड़े , हाथी आदि का संकेतक था , किन्तु आज वह स्कूटर , मोटरसाइकिल और कार का संकेतक है। किसी जन्मकुंडली में असाध्य रोग से ग्रस्त होने का योग है , तो वह किसी युग में व्यक्ति को टी बी का मरीज बनाता था , उसके बाद कैंसर का और आज वही योग उसे एड्स का मरीज बना देता है। यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में उत्तम विद्या का योग हो तो वह प्राचीनकाल में किसी प्रकार की विद्या की जानकारी देता था , उसके बाद बी और एम ए की डिग्री तथा आज वह एम बी ए और एम सी ए जैसी डिग्री दिलाने में सहायक होता है।

        

वातावरण में परिवर्तन भी ग्रहों के प्रभाव में परिवर्तन ले जाता है। किसी किसान या व्यवसायी का उत्तम संतान पक्ष लड़के की संख्या में बढ़ोत्तरी कर सकता है , ताकि वे बड़े होकर परिवार की आमदनी बढ़ाएं , किन्तु एक ऑफिसर के लिए उत्तम संतान का योग संतान के गुणात्मक पहलू की वृद्धि करेगा। किसी जन्मपत्री में कमजोर संतान का योग एक किसान के लिए आलसी , बड़े व्यवसायी के लिए ऐयाश और ऑफिसर के लिए बेरोजगार बेटे का कारण बनेगा। । किसी किसान के पुत्र की कुंडली में उत्तम विद्या का योग होने से वह ग्रज्युएट होगा , किन्तु किसी ऑफिसर के पुत्र का वही उत्तम योग उसे आई ए एस बना सकता है। किसी किसान के लिए उत्तम मकान का योग उसे पकके का दोमंजिला मकान ही दे सकता है , किन्तु एक बड़े व्यवसायी का वही योग उसे एक शानदार बंगला देगा। किसी कुंडली में बाहरी स्थान से संपर्क का योग किसी ग्रामीण को शहरी क्षेत्र का , किसी शहरी व्यक्ति को महानगर का तथा महानगर के व्यक्ति के लिए विदेश के भ्रमण का कारण बन सकता है। किसी कुडली में ऋणग्रस्तता का योग एक साधारण व्यिक्त् को 500-1000 का तथा बड़े व्यवसायी को करोड़ों का ऋणी बना सकता है।

   

अलग अलग देश और प्रदेश के अनुसार भी ग्रहों के प्रभाव में परिवर्तन आता है। किसी विकसित देश में किसी महिला का प्रतिष्ठा का योग उसे प्रतिष्ठित नौकरी देगा , जबकि भारत के ग्रामीण क्षेत्र की महिला को सिर्फ अच्छा घर-वर ही प्रदान कर सकता है। किसी लड़की की कुंडली में दृष्ट हल्का कमजोर पति पक्ष भारत में सिर्फ परेशानी देनेवाला होगा , जबकि अमेरिका जैसे देश में वह तलाक देने और दिलानेवाला होगा।

 

 

 

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