निम्न वर्ग के बच्चे : कौन अच्छे

अनेकों स्टेशनों पर या भीड़-भाड़ वाले बाजार में छ: वर्ष से 12 वषZ तक के बच्चों के पूरे समूह को हाथ में कटोरा लेकर भीख मॉगते हुए देखा जा सकता है। उन्हें देखकर आनेवाली दया और सहानुभूति की भावना उनकी कार्यप्रणाली को देखकर ही रफूचक्कर हो जाती है। जैसे ही वे किसी महिला या पुरुष के निकट आएंगे, अपने पेटों को छू-छूकर अपने को भूखे साबित करने का कृति्रम नाटक करते हुए उनके पैरों को छृएंगे। जिन सज्जन के द्वारा उन्हें कुछ सिक्के मिल जाएंगे, अपने समूह के दूसरे बच्चे को भी उनके पास भेज देंगे। जैसे ही उन बच्चों को यह महसूस होता है कि वे देखनेवालों की नजर से ओझल हो गए हैं, उनके चाल में मस्ती आ जाती है। उनका ारीर नाचने-गाने लगता है, बीच-बीच में पैसे अपने गंतब्य तक पहुंचाकर वे वापस लौटकर पुन: भीख मॉगना आरंभ कर देते हैं। इस दुनियॉ में तो धार्मिक दृिष्टकोण के लोगों की कमी नहीं है, दिन-भर उन्हें पैसों के अलावा खाने-पीने के लिए भी तरह-तरह की सामगि्रयॉ मिलती रहती हैं। उनका शरीर और व्यक्तित्व कैसा भी हो, मन बिल्कुल प्रसन्न होता है।
दूसरी ओर ऐसे बाल-मजदूर भी हैं, जो दिनभर अपने मालिक के घर या फैक्टरी में कार्य करते रहते हैं। जहॉ घर में रहनेवालों को घर का बचा-खुचा खाना और ही मिल पाता है, वहीं फैक्टरीवाले के वेतन में भी सिर्फ भरपेट भोजन की व्यवस्था ही होती है। साथ ही किसी काम में गलती होने पर दिनभर डॉट की संभावना बनीं ही होती है। छुट्टी लेने या छुट्टी मॉगने का तो उन्हें कोई अधिकार ही नहीं है, किन्तु फिर भी मन में सारी कटुताओं को दबाए हुए मालिक के द्वारा दिए गए कपड़ों को पहनकर सारे कायदे-कानूनों को सीखने में ही अपनी दिलचस्पी रखता है, ताकि आनेवाले वषोZं में मालिक खुश होकर वेतन में कुछ बढ़ोत्तरी कर दे।
दोनों ही तरह के बच्चे निम्न स्तर के परिवारों से हैं, किन्तु दोनों को संस्कार अलग-अलग दिए गए हैं। पहले वर्ग के बच्चों को मिला संस्कार जहॉ उसके वत्र्तमान को आरामदेह बना सकता है, वहीं दूसरे वर्ग के बच्चे को मिला संस्कार उसके भविष्य को बेहतर बनाने में काम आ सकता है। बिना मेहनत किए पैसे कमाने या जुटाने की प्रवृत्ति पहले वर्ग के बच्चे को कामचोर बना रही है, जिस दिन उन्हें पैसे मिलने बंद हो जाएंगे, उसी दिन वे चोरी करना सीख जाएंगे, किन्तु हर काम में छोटी-सी गल्ती किए जाने पर डॉट-फटकार लग जाने के कारण दूसरे वर्ग के बच्चे काम में कुशल हो रहे हैं। भविष्य में भी उनकी कार्यक्षमता में बढ़ोत्तरी होने की ही संभावना है, जो उसके आगे के मार्ग को प्रशस्त करने में सहायक होगा।

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About संगीता पुरी

नाम - संगीता पुरी , उम्र - 42 वर्ष , पढ़ाई - रांची विश्वविद्यालय से एम ए (अर्थ शास्त्र ) , विवाह - १२ मार्च १९८८ को पति - श्री अनिल कुमार ( डी वी सी में कार्यरत ), पुत्र - दो विपुल और विभास , दोनों डी पी एस बोकारो मैं विद्यार्थी , पता - ९४ , को-operative कॉलोनी ,बोकारो स्टील सिटी रूचि - ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकलने में सफ़लता पाते रहना , जो सिक्षा मुझे मेरे पिताजी ने डी है . प्रकाशित पुस्तकें - १. गत्यात्मक ज्योतिष : ग्रहों का प्रभाव . प्रकाशित लेख - the astrological मैगज़ीन , बाबाजी ,ज्योतिष-धाम आदि में . E-mail - gatyatmak_jyotish@yahoo.co.in
यह प्रविष्टि जीवनशैली में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

One Response to निम्न वर्ग के बच्चे : कौन अच्छे

  1. bornleader कहते हैं:

    आपको नही लगता भीख मांगना भी एक श्रम साध्य कार्य है । प्रकार अलग है पर संघर्ष तो दोनों में एक सा है। परवशता भी दोनों में एक जैसी है। भिखारी शिशु भी किसी की चाकरी ही तो कर रहा है।
    आपका विवेचन काफ़ी विचार पूर्ण है संगीता जी। और आपका लेखन प्रवाह पूर्ण।
    महेंद्र
    msverma@gmail.com

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