त्‍यौहार के बहाने कीड़े-मकोड़े-किटाणुओं का समूल नाश

वर्षा ऋतु की समाप्ति के तुरंत बाद दीपावली ,सबसे पहले देवी लक्ष्मी का स्वागत करने के क्रम में दीपावली के नाम पर मिट्टी-चूना-रंग-रोगन से या फिर सामान्य तौर पर साफ-सफाई करके ही अपने-अपने घरद्वार को चिकना कर दिया जाता है। अगरबत्ती और धूप जलाते हुए अपने-अपने घरों को शुद्ध किया जाता है। उसके बाद दूसरे ही दिन बारी आती है — , दीए गोवर्द्धन-पूजा के नाम पर गाय-बैल और गोशाले की सफाई कर दीए क्योंकि शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ही गायों की पूजा होती है। इस पूजा के बाद मात्र तीन दिन ही बचते हैं वहॉ जाने के रास्तों के घास-फूसों को हटाते हुए घाट तक की पूरी सफाई कर दी जाती है।  अगरबत्ती और धूप जलाते हुए वहॉ मौजूद किटाणुओं और कीड़े-मकोड़े को नष्ट करने की ,, छठ-पूजा के लिए , जिसकी तैयारी के क्रम में सामूहिक कार्यक्रम के तहत् नदी और पोखर , , नदियों , तालाबों के अंदर की मिट्टी से पूजा के लिए पिंड बनाने के क्रम में इनपर जमी बरसात की मिटि्टयों को हटाते हुए नदियों को गहरा और घाट को उंचा किया जाता है। धर्म के नाम पर इस कार्यक्रम में सबका सहयोग प्राप्त होता है। छठ के दिन वहॉ भी धूप , दीप जलाकर वातावरण को शुद्ध करने का क्रम जारी रहता है। वास्तव में इन तीनों त्यौहारों का दवाब ही है कस्बे और शहर की सुंदरता बढ़ जाती है। इतने कम समय में इतने कार्यों कस्बे या शहर से बरसात के कारण हुई गंदगी का नामोनिशान ही मिट जाता है। कम से कम एक साथ कहा जाए तो सामूहिक तौर पर इतने सारे कीड़े-मकोड़े और किटाणुओं को समूल नष्ट कर पाना किसी भी स्थिति में संभव न था , जो कि हर वर्ष ,जिनके नाम पर इतनी तेजी से सफाई की जाती है और देखते ही देखते बिहार , झारखंड और आसपास के अन्य राज्यों में , जहॉ ये तीनों त्यौहार मनाए जाते हैं , पूरे गॉव , को अंजाम दे पाना कभी भी संभव न था। धीरे-धीरे आराम से सफाई होती या फिर हर जगह नहीं भी हो पाती। सभी लोग नए उत्साह से खरीफ फसलों की कटाई-गुड़ाई शुरु कर देते हैं।आज भले ही परंपरा के नाम पर होनेवाले इन त्यौहारों के लिए हम हंसें और समय न निकाल पाएं , पर वास्तव में धन्य होंगे वे महापुरुष , जिन्होनें परंपरा के नाम पर इन त्यौहारों की शुरुआत की , जिनका आज के युग में भी महत्व है! इससे यह भी साबित हो जाता है कि धर्म वास्‍तव में युग और स्‍थान के अनुरूप जीने की शैली है।   

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About संगीता पुरी

नाम - संगीता पुरी , उम्र - 42 वर्ष , पढ़ाई - रांची विश्वविद्यालय से एम ए (अर्थ शास्त्र ) , विवाह - १२ मार्च १९८८ को पति - श्री अनिल कुमार ( डी वी सी में कार्यरत ), पुत्र - दो विपुल और विभास , दोनों डी पी एस बोकारो मैं विद्यार्थी , पता - ९४ , को-operative कॉलोनी ,बोकारो स्टील सिटी रूचि - ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकलने में सफ़लता पाते रहना , जो सिक्षा मुझे मेरे पिताजी ने डी है . प्रकाशित पुस्तकें - १. गत्यात्मक ज्योतिष : ग्रहों का प्रभाव . प्रकाशित लेख - the astrological मैगज़ीन , बाबाजी ,ज्योतिष-धाम आदि में . E-mail - gatyatmak_jyotish@yahoo.co.in
यह प्रविष्टि जीवनशैली में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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