गत्यात्मक ज्योतिष का आधार

सौरमंडल में भले ही सूर्य स्थिर हो और अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हों , परंतु फलित ज्योतिष पृथ्वी को स्थिर मानकर उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करता है। पृथ्वी को सापेक्ष मान लेने से सभी ग्रह भिन्न-भिन्न गतियों में देखे जाते हैं , ग्रहों गति की यही भिन्नता गत्यात्मक ज्योतिष का आधार है। गत्यात्मक ज्योतिष ने ग्रहों की गतियोंं को निम्न भागों में बॉटा है ——

अतिशीघ्री गति इस समय ग्रहों की कोणात्मक दूरी सूर्य से बहुत कम होती है। ऐसे समयों में ग्रहों की दूरी पृथ्वी से बहुत बढ़ जाया करती है। इस समय ये किसी भी स्थिति में पृथ्वी से नहीं देखे जा सकते। इस अतिशीघ्री स्थिति में ग्रह सर्वाधिक गत्यात्मक शक्ति संपन्न होते हैं। एक चंद्रमा को ही सर्वाधिक गत्यात्मक शक्ति संपन्नता की स्थिति में देखा जा सकता हैं , क्योकि यह पूणिZमा के आसपास ऐसी स्थिति में होता है।

शीघ्री गति इस समय ग्रहों की कोणात्मक दूरी सूर्य से थोड़ी अधिक होती है। ऐसे समय में भी सूर्य से ग्रहों की दूरी बढ़ी हुई ही होती है , किन्तु फिर भी ये कभी-कभी पृथ्वी से देखे जा सकते हैं। इस समय ग्रह सामान्य से अधिक गत्यात्मक शक्ति संपन्न होते हैं।

सामान्य गति इस समय मंगल , बृहस्पति , शनि , चंद्रमा आदि ग्रह सूयोZंदय या सूर्यास्त के समय मध्य आकाश में होते हैं , बुध और शुक्र सूयोZदय या सूर्यास्त के समय पूर्वी या पिश्चमी क्षितिज पर सर्वाधिक उंचाई पर होते हैं। इस समय पृथ्वी से इन ग्रहों की दूरी सामान्य होती है। ये ग्रह सूर्यास्त के बाद देखे जा सकते हैं। शुक्र ऐसी स्थिति में ही सूयोZदय के पहले दिखाई पड़ता है , जिसके कारण इसे भोर के तारे के रुप में जाना जाता है। इस समय ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति सामान्य होती है। सूर्य हर वक्त सामान्य गति का होता है , इसलिए इसे हर स्थिति में सामान्य गत्यात्मक शक्ति का माना जाता है।

मंद गति विभिन्न ग्रहों के वक्री होने के पूर्व और मार्गी होने के पश्चात् ऐसी स्थिति आती है। इस समय पृथ्वी से ग्रहों की दूरी और कम होने लगती है। गति भी सामान्य से और कम हो जाती है। बुध और शुक्र को छोड़कर अन्य ग्रहों को इस स्थिति में देखा जा सकता है। इस समय ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति सामान्य से कुछ कम होती है।

वक्री गति इस समय ग्रह वक्री स्थिति में होते हैं। बुध और शुक्र को छोड़कर अन्य ग्रहों को इस स्थिति में देखा जा सकता है। इस समय ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति काफी कम होती है।

अतिवक्री गति इस समय ग्रहो की वक्री गति में भी बढ़ोत्तरी होने लगती है। बुध , शुक्र और चंद्रमा को छोड़कर अन्य ग्रहों को इस स्थिति में मध्य राति्र में मध्य आकाश में चमकते हुए देखा जा सकता है। इस समय ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति शून्य होती है।

(मेरी पुस्तक `गत्यात्मक दशा पद्धति : ग्रहों का प्रभाव´ से उद्धृत)

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About संगीता पुरी

नाम - संगीता पुरी , उम्र - 42 वर्ष , पढ़ाई - रांची विश्वविद्यालय से एम ए (अर्थ शास्त्र ) , विवाह - १२ मार्च १९८८ को पति - श्री अनिल कुमार ( डी वी सी में कार्यरत ), पुत्र - दो विपुल और विभास , दोनों डी पी एस बोकारो मैं विद्यार्थी , पता - ९४ , को-operative कॉलोनी ,बोकारो स्टील सिटी रूचि - ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकलने में सफ़लता पाते रहना , जो सिक्षा मुझे मेरे पिताजी ने डी है . प्रकाशित पुस्तकें - १. गत्यात्मक ज्योतिष : ग्रहों का प्रभाव . प्रकाशित लेख - the astrological मैगज़ीन , बाबाजी ,ज्योतिष-धाम आदि में . E-mail - gatyatmak_jyotish@yahoo.co.in
यह प्रविष्टि गत्यात्मक ज्योतिष में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

2 Responses to गत्यात्मक ज्योतिष का आधार

  1. jayHind Singh कहते हैं:

    I would like to know my future,ple snd daily my mail

  2. RAMAN कहते हैं:

    HI DIDI HOW R U? I M RAMAN FROM DELHI. I LIKE UR COMMENT ON ASTROLOGY. KINDLY MAIL MY 2008 HOROSCOPE ON MY MAILING ADDRESS. RAMAN-MARS

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