मेरा यह 100 वां महत्वपूर्ण पोस्ट : आप सब अवश्य पढें

(यह शोध-पत्र मेरे पिता विद्यासागर महथाजी के द्वारा नई दिल्ली में पूसा गेट के समीप राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला सभागार में 19 से 21 फरवरी 2004 को आयोजित किए गए तृतीय अखिल भारतीय विज्ञान सम्मेलन में भेजा गया था, इस सामग्री को संक्षिप्त रूप में सेमिनार के जर्नल में भी प्रकाशित भी किया गया था। इसे समझने में आप सब पाठकगणों को कुछ असुविधा अवश्य होगी, पर मेरा अनुरोध है कि आप इसे समझने की कोशिश अवश्य करें।)    

मानव-जीवन पर ग्रहों का पड़नेवाला प्रभाव अभी तक विवादास्पद विषय ही बना होता, यदि मुझे ग्रहों की शक्ति और गति के बारे में अपना 40 वर्षों की खोज में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी न हासिल हो गयी होती । परंतु आज ग्रहों की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति  निकालने के सूत्रों के प्रतिपादन एवं इसके मानव जीवन पर पड़नेवाले प्रभाव के सटीक खोज से मै इसकी विवादास्पदता को मिटा पाने में समर्थ हो चुका हूं । 

पृथ्वी को अपने परिभ्रमण-पथ के किसी बिंदू पर स्थिर मान लेने से किसी भी ग्रह की अपने परिभ्रमण-पथ के विभिन्न बिंदुओं पर सूर्य और पृथ्वी से भिन्न-भिन्न कोणिक दूरी बनती है । हर स्थिति में पृथ्वी से ग्रहों की वास्तविक दूरी में भी अंतर देखा जाता है । यही नहीं , अपने परिभ्रमण पथ के विभिन्न बिंदुओं पर ग्रहों की सापेक्षिक गति भी पृथ्वी और सूर्य से उसकी कोणिक दूरी पर निर्भर करती है । इस गति के अनुसार ही सभी ग्रह शक्ति प्राप्त करतें हैं , जिसे गत्यात्मक शक्ति कहा जा सकता है । इसी शक्ति के अनुसार ही ग्रह विभिन्न अवधि में जातक को फल प्रदान करतें हैं ।

 

MARSNEW

 

 

 

इस छोटे से शोधपत्र में सारे ग्रहों की चर्चा संभव नहीं है । इसलिए मै सिर्फ एक ग्रह मंगल की चर्चा कर रहा हूं । संलग्न चित्र में O बिंदू पर सूर्य स्थित है , ABCD पृथ्वी का परिभ्रमण पथ है ,जिसमें पृथ्वी किसी भी बिंदू पर स्थित हो सकती है । इसी तरह मंगल अपने परिभ्रमण-पथ UTVWPXQYZS के किसी भी बिंदू पर हो सकता है ।

संलग्न चित्र( यदि चित्र बडा न हो रहा हो तो <a href = “http://2.bp.blogspot.com/_umJcj5hbyeg/StRlVlzhS3I/AAAAAAAAAQQ/hf7w9fzAzIg/s1600-h/MARSNEW.JPG”>यहां</a>क्लिक करें)के अनुसार सबसे पहले मै पृथ्वी के A बिंदू पर  स्थित होने की कल्पना करना चाहूंगा । यदि सूर्य O तथा पृथ्वी A बिंदू पर स्थित हो तो X बिंदू पर मंगल की स्थिति से सूर्य , पृथ्वी और मंगल के मध्य 180 डिग्री का कोणिक दूरी बनती है । इस समय मंगल की पृथ्वी से वास्तविक दूरी भी सबसे कम होती है । पृथ्वी सापेक्ष मंगल की गति पर जब मैने ध्यान दिया तो पाया कि इस समय मंगल सर्वाधिक वक्र गति में है ।

 इसी प्रकार यदि सूर्य O तथा पृथ्वी A बिंदू पर स्थित हों तो W बिंदू पर मंगल की स्थिति से सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य लगभग 135 डिग्री का की कोणिक दूरी बनती है । इस समय मंगल से पृथ्वी की वास्तविक दूरी सामान्य से कम होती है । इस समय मंगल की सापेक्षिक गति शून्य होती है यानि न तो वह आगे बढ़ने और न ही पीछे खिसकने की ही स्थिति में होता है ।

 इसी प्रकार O बिंदू पर सूर्य ,A बिंदू पर पृथ्वी ,तथा  Z बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 90 डिग्री का कोण बनता है । इस समय मंगल पृथ्वी से सामान्य वास्तविक दूरी पर होता है और इसकी प्रतिदिन की गति भी सामान्य रुप से आगे बढनेवाली होती है ।

 O बिंदू पर सूर्य , A बिंदू पर पृथ्वी तथा U बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 0 डिग्री का कोण बनता है । इस समय मंगल से पृथ्वी की वास्तविक दूरी बहुत अधिक होती है । इसकी प्रतिदिन की गति भी सामान्य से काफी अधिक होती है ।

O बिंदू पर सूर्य A बिंदू पर पृथ्वी तथा V बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से पुन: सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 90 डिग्री का कोण बनता है । इस समय मंगल की पृथ्वी से वास्तविक दूरी पुन: सामान्य होती है । मंगल की गति भी यहॉ पर सामान्य रुप से आगे बढ़नेवाली होती है ।

O बिंदू पर सूर्य ,A बिंदू पर पृथ्वी तथा W बिंदू पर मंगल की स्थिति होने से पुन: सूर्य ,पृथ्वी और मंगल के मध्य 135 डिग्री के आसपास का कोण बनता है । इस समय पुन: मंगल की पृथ्वी से दूरी सामान्य से कुछ कम हो जाती है  और इसकी गति शून्य यानि पृथ्वी के समानान्तर होती है ,जिसके कारण न तो वह आगे बढ़ता और न ही पीछे खिसकता दिखाई देता है ।  

पुन: X बिंदू पर वह अपनी पूर्व अवस्था को लौट आता है । मंगल की इन विभिन्न स्थितियों का मैने भिन्न-भिन्न नाम रखा है । मंगल को X स्थिति पर अतिवक्र ,Y स्थिति पर मार्गी , Z स्थिति पर आरोही समगतिशील , U स्थिति पर अतिशीघ्री , V स्थिति पर अवरोही समगतिशील तथा  W स्थिति पर वक्री माना गया है ।  

X स्थिति से Y स्थिति तक मंगल की वक्रता क्रमष: कम होती चली जाती है । Y से  Z स्थिति तक यह सामान्य गति प्राप्त करने को आगे बढ़ता है ।   Z से U तक इसकी गति काफी तेज हो जाती है । U स्थिति से V स्थिति तक उसकी गति कम होती हुई सामान्य तक पहुंचती है । V से W की स्थिति में वह सामान्य से कम गति प्राप्त करता है तथा  W से X स्थिति तक उसकी गति ऋणात्मक हो जाती है ।

X स्थिति से पुन: X स्थिति तक पहुंचने में मंगल को लगभग 26 महीने लगते हैं । X स्थिति से Y स्थिति तक लगभग 1 महीने ,Y स्थिति से   Z स्थिति तक लगभग तीन महीने ,  Z स्थिति से U स्थिति तक लगभग दस महीने  ,U स्थिति से V स्थिति तक लगभग  आठ महीने ,V से W तक तीन महीने तथा W से X तक लगभग एक महीने की यात्रा मंगल को करनी पड़ती है ।

मंगल की उपरोक्त विभिन्न स्थितियों के मानव जीवन पर भिन्न-भिन्न प्रभाव को देखने के बाद ही इसकी गत्यात्मक रहस्य को ढूंढ़ पाने में मुझे कामयाबी मिली । U स्थिति में मंगल सर्वाधिक गत्यात्मक शक्ति-संपन्न , V और  Z बिंदू पर सामान्य गत्यात्मक शक्ति-संपन्न ,  W और Y बिंदू पर सामान्य से कम गत्यात्मक शक्ति-संपन्न तथा X स्थिति में शून्य गत्यात्मक शक्ति-संपन्न होता है ।  मंगल की इस गत्यात्मक शक्ति के आकलण के लिए मैने निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया —-

गत्यात्मक शक्ति = [{(180-angular distance of sun and mars)/180}*100

मंगल युवावस्था को प्रभावित करनेवाला ग्रह है  और इसका प्रभाव मनुष्य के 24 वर्ष से 30 वर्ष की अवस्था तक अधिक पड़ता है । 30वें वर्ष में इसके प्रभाव को अधिक महसूस किया जा सकता है । मैने अपने अध्ययन में पाया कि U स्थिति के आसपास यानि  S बिंदू से T बिंदू तक के पथ पर मंगल के होने के समय जो जन्म लेते हैं , अपनी युवावस्था में काफी सहज-सुखद वातावरण प्राप्त करते हैं । V और W या Y और  Z बिंदूओं के मध्य मंगल होने के वक्त जो पृथ्वी पर जन्म लेते हैं ,अपनी युवावस्था में उनके सम्मुख दायित्वों का बोझ होता है । वे महत्वाकांक्षी होते हैं और अपनी पहचान बनाने पर विष्वास करते हैं । X बिंदू के आसपास मंगल के होने के वक्त पृथ्वी पर जन्म लेनेवाले जातक युवावस्था में निराष और कुंठित वातावरण में जीवन जीने को बाध्य होते हैं ।1978 से 1984 तक मंगल की अपने परिभ्रमण पथ के विभिन्न विंदुओं की स्थिति को चार्ट-1 द्वारा दिखाया जा सकता है ।

तालिका-1

 

year

S

U

T

V

W

X

Y

Z

1978

2  अक्तूबर 

 

 

 

 

30  जनवरी 

3  मार्च 

25  अप्रैल 

1979

 

 

16  जनवरी 

9  जून 

23  नवम्बर 

 

 

 

 

1980

 

20  नवम्बर 

 

 

 

17  जनवरी 

26 फरवरी 

8  अप्रैल 

8  जून 

1981

 

5  अप्रैल 

3  अगस्त 

27  दिसम्बर 

 

 

 

 

1982

 

 

 

 

22  फरवरी 

31  मार्च 

13  मई 

9  जुलाई 

1983

22  जनवरी 

4  जून 

12  सितम्बर 

 

 

 

 

 

1984

 

 

 

1  फरवरी 

7  अप्रैल 

10  मई 

21 जून 

30  अगस्त 

 

  जातक अपनी जन्मकालीन मंगल की गति , स्थिति और गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही अपनी युवावस्था में यानि 24 वर्ष  से 30 वर्ष की उम्र में परिस्थितियॉ प्राप्त करतें है । इस आधार पर 24 से 30 वर्ष के युवा वर्ग को तीन भागों में बॉटा जा सकता है  ।

 

 

        प्रथम  वर्ग यानि U बिंदू के आसपास यानि S से T बिंदू पर मंगल के स्थित होने के मध्य जन्म लेनेवाले जिन्हें प्रकृति नें हर प्रकार की सुख-सुविधा मुहैया करा रखी है और इनका काम सिर्फ आनंद लेना है । ये किसी बड़े काम को संभालने के लायक नहीं होते हैं ।

        द्वितीय  वर्ग यानि V से W या Z से Y बिंदूओं के मध्य मंगल के स्थित होने के वक्त जन्मलेनेवाले युवक-युवतियॉ ,जो महत्वाकांक्षी हैं , काम से नहीं घबडातें हैं और लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं । इन्हें इस अवधि में बडी-बडी जिम्मेदारियां सौंपी जाती है ।

         तृतीय  वर्ग  यानि X बिंदू के आसपास यानि P से Q बिंदू के मध्य मंगल स्थित होने के वक्त जन्मलेनेवाले युवक-युवतियॉ, जिनके सम्मुख बार-बार कठिनाइयॉ उपस्थित होती हैं , जिससे इनके आत्मविश्वास में कमी आती है । ये इस अवधि में तनावग्रस्त होते हैं । 

                   24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र के हर युवक और युवतियॉ अपने जन्मकालीन मंगल की स्थिति के अनुसार ही किसी प्रकार के कार्यक्रम बना पाते हैं।

1978 से 1984 तक जन्म लेनेवाले विश्व-भर के सभी युवाओं की चर्चा इस लेख में की जा सकती है ,क्योंकि वे अभी 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र के अंतर्गत हैं ,इसलिए वे अपनी जन्मकालीन मंगल की गत्यात्मक स्थिति के अनुसार अभी परिस्थितियॉ प्राप्त कर रहें हैं । इन युवकों के परिस्थितियों की चर्चा उनकी जन्मकालीन मंगल की गति को देखकर आसानी से की जा सकती है और इस आधार पर इन्हें तालिका-2 के अनुसार तीन वगो में इस प्रकार रखा जा सकता है ।

 

 

 

 

 

तालिका-2

प्रथम  वर्ग 

द्वितीय  वर्ग 

तृतीय  वर्ग 

निम्न समयांतराल में जन्म लेनेवाले युवक-युवतियॉ 

निम्न समयांतराल में जन्म लेनेवाले युवक-युवतियॉ 

निम्न समयांतराल में जन्म लेनेवाले युवक-युवतियॉ 

2 अक्तूबर 1978 से 9 जून 1979 तक

20 नवम्बर 1980 से 3 अगस्त 1981 तक

22 जनवरी 1983 से 12 सितम्बर 1983 तक

3 मार्च 1978 से 25 अप्रैल 1978 तक

23 नवम्बर 1979 से 17 जनवरी 1980 तक

8 अप्रैल 1980 से 8 जून 1980 तक

27 दिसमबर 1981 से 22 फरवरी 1982 तक

13 मई 1982 से 9 जुलाई 1982 तक

1 फरवरी 1984 से 7 अप्रैल 1984 तक

21 जून 1984 से 30 अगस्त 1984 तक    

1977 के अंत से 1978 के 3 मार्च तक

17 जनवरी 1980 से 8 अप्रैल 1980 तक

22 फरवरी 1982 से 13 मई 1982 तक

7 अप्रैल 1984 से 21 जून 1984 तक

 

संलग्न चित्र के अनुसार मंगल की स्थिति 2007 में 19 सितम्बर को V बिंदू पर होगी तथा 15 नवम्बर 2007 को W बिंदू पर । गोचर में जब भी मंगल अपने पथ पर V बिंदू से आगे बढ़ता है , युवा वर्ग विशेष प्रकार की घटनाओं से प्रभावित होते हैं । V से W के मध्य जब मंगल की स्थिति होती है ,तो इन तीन महीनों में जहॉ पहले वर्ग के लोग अपनी सुख-सुविधा में और इजाफा प्राप्त करतें हैं ,वहीं दूसरे वर्ग के लोग अपने लिए नए कार्यक्रम ,परंतु तीसरे वर्ग के लोगों को नई समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ता है । इस आधार पर 19 सितम्बर से 15 नवम्बर 2007 तक खास तौर पर जहॉ पहले वर्ग के जहॉ पहले वर्ग के लोगों को सुख.सुविधा में कुछ इजाफा मिला होगा , वहीं दूसरे वर्ग के लोगों ने अपने लिए नए कार्यक्रम प्राप्त किए होंगे, परंतु तीसरे वर्ग के लोगों को नई समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ा होगा।

15 नवम्बर 2007 की W विंदू से लेकर 25 दिसम्बर 2007 की X विंदू तक की मंगल की स्थिति से पहले वर्ग के लोगों के सम्मुख लाभ में कुछ कमी का अहसास होना चाहिए , दूसरे वर्ग के लोग भी छोटी मोटी बाधा उपस्थित पाए होंगे, किन्तु तीसरे वर्ग के लोग किंकर्तब्यविमूढ़ अवस्था में अपनी समस्याओं से जूझते रहे होंगे। 25 दिसम्बर 2007 की X विंदू से 1 फरवरी 2008 की Y विंदू तक की मंगल की स्थिति पहले वर्ग के लोगों सम्मुख उपस्थित लाभ की कमी को दूर करने की कोशिश में होंगी , दूसरे वर्ग के लोगों की बाधाएं भी क्रमशः दूर होती दिखाई पड़ेंगी और तीसरे वर्ग के लोग भी अंधेरे में दूर दिखाई देते रोशनी के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे ।

 

1 फरवरी 2008 की Y विंदू से 30 मार्च 2008 की Z विंदू तक की मंगल की स्थिति के कारण पुन: पहले वर्ग के लोगों का माहौल उत्साहजनक होगा, दूसरे वर्ग के लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में व्यस्त होंगे, किन्तु लाख उपायों के पश्चात भी तीसरे वर्ग के लोगों को निराशाजनक फल ही प्राप्त हो रहे होंगे ।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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About संगीता पुरी

नाम - संगीता पुरी , उम्र - 42 वर्ष , पढ़ाई - रांची विश्वविद्यालय से एम ए (अर्थ शास्त्र ) , विवाह - १२ मार्च १९८८ को पति - श्री अनिल कुमार ( डी वी सी में कार्यरत ), पुत्र - दो विपुल और विभास , दोनों डी पी एस बोकारो मैं विद्यार्थी , पता - ९४ , को-operative कॉलोनी ,बोकारो स्टील सिटी रूचि - ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकलने में सफ़लता पाते रहना , जो सिक्षा मुझे मेरे पिताजी ने डी है . प्रकाशित पुस्तकें - १. गत्यात्मक ज्योतिष : ग्रहों का प्रभाव . प्रकाशित लेख - the astrological मैगज़ीन , बाबाजी ,ज्योतिष-धाम आदि में . E-mail - gatyatmak_jyotish@yahoo.co.in
यह प्रविष्टि विज्ञान में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

5 Responses to मेरा यह 100 वां महत्वपूर्ण पोस्ट : आप सब अवश्य पढें

  1. उन्मुक्त कहते हैं:

    कुछ कम समझ में आया 😦 पर शतक लगाने की बधाई।

  2. समीर लाल कहते हैं:

    इतना गणित जान पाते तो आज आपके बीच न होते. फिर भी जो जान पाये तदानुसार १०० वीं पोस्ट की बधाई…सच बतायें..दो लाईन के बाद पढ़ने की हिम्मत छूट गई और शीर्षक के आधार पर टिपिया रहे हैं…शायद सट्टा सही बैठे. 🙂

  3. mehhekk कहते हैं:

    100 th post ke liye bahut bahut badhai,aapne jo bhi charcha yaha ki hai,atyant lajawab hai,hame in baaton ka gyan jyada nahi,magar aapne jis tarah samjhaya hai,bahut khub,kuch baatien hamare samjh ke pare hai,magar,it was very interesting.

  4. मोहिनी कहते हैं:

    वैसे मे इन ग्रहो-व्रहो से हंमेशा दुर भागती रेहती हु, बहुत सुना था की राहु यहा है चंद्र वहा है सुर्य यहा ये दशा है तो ये सब सुनके मेरे तो कुछ पल्ले हि नही पडता !!! लेकीन आपकी लीखावट बहुत अच्छी है…और 100 नंबर के पोस्ट कलीये ढेरसारी शुभकामनाए..

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